पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के ‘यूपी-बिहार के भैया’ वाली टिप्पणी को लेकर पंजाब में सियासत गरमाई हुई है। उनके इस बयान को विरोधियों ने यूपी-बिहार के प्रवासियों का अपमान बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक ने इस बयान को लेकर चन्नी और कांग्रेस को घेरा है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के युवा विंग ने बिहार में चरणजीत सिंह चन्नी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कराया है। वहीं कांग्रेस के अंदर भी इस मुद्दे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस विवाद की तुलना अमेरिका के अश्वेत मुद्दे से की है। पंजाब में इस मुद्दे ने इसलिए तूल पकड़ा है क्योंकि वहां की अर्थव्यवस्था में यूपी-बिहार के श्रमिकों का बहुत योगदान माना जाता है। इस रिपोर्ट के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि पंजाब में इन श्रमिकों का क्या योगदान है और पंजाब की राजनीति पर उनका क्या असर है?
पंजाब में प्रवासियों का जाना कब से शुरू हुआ?
1970 के दशक में हरितक्रांति की शुरुआत से। जब हरित क्रांति ने जड़ें जमा लीं तो यूपी-बिहार (तब के झारखंड का हिस्सा भी) के प्रवासी श्रमिक शुरू में धान की बुआई के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचने लगे। बाद में वे कारखानों में भी काम करने लगे। 1978 में पंजाब में प्रवासी मजदूरों की संख्या 2.18 लाख थी जो अब कई गुना बढ़ गई है। 2016 में शिअद-भाजपा सरकार की प्रवासी विंग की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार उस समय प्रवासियों की अनुमानित आबादी 39 लाख थी।
शिअद के प्रवासी विंग के अध्यक्ष राम चंदर यादव के बयान के मुताबिक पिछले कुछ सालों में यह संख्या बढ़कर लगभग 43 लाख हो गई है। पूर्वांचल प्रवासी संगठन के अनुसार भी पंजाब में 43 लाख प्रवासी रहते हैं। यह आबादी सबसे ज्यादा लुधियाना, जालंधर, अमृतसर, मोहाली, बठिंडा, फगवाड़ा और होशियारपुर में रहती है। अकेले औद्यौगिक शहर लुधियाना में करीब सात लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं।
प्रवासी मजदूर (फाइल फोटो)
- फोटो : Amar Ujala
पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के ‘यूपी-बिहार के भैया’ वाली टिप्पणी को लेकर पंजाब में सियासत गरमाई हुई है। उनके इस बयान को विरोधियों ने यूपी-बिहार के प्रवासियों का अपमान बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक ने इस बयान को लेकर चन्नी और कांग्रेस को घेरा है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के युवा विंग ने बिहार में चरणजीत सिंह चन्नी के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज कराया है। वहीं कांग्रेस के अंदर भी इस मुद्दे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस विवाद की तुलना अमेरिका के अश्वेत मुद्दे से की है। पंजाब में इस मुद्दे ने इसलिए तूल पकड़ा है क्योंकि वहां की अर्थव्यवस्था में यूपी-बिहार के श्रमिकों का बहुत योगदान माना जाता है। इस रिपोर्ट के जरिए यह समझने की कोशिश करते हैं कि पंजाब में इन श्रमिकों का क्या योगदान है और पंजाब की राजनीति पर उनका क्या असर है?
पंजाब में प्रवासियों का जाना कब से शुरू हुआ?
1970 के दशक में हरितक्रांति की शुरुआत से। जब हरित क्रांति ने जड़ें जमा लीं तो यूपी-बिहार (तब के झारखंड का हिस्सा भी) के प्रवासी श्रमिक शुरू में धान की बुआई के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंचने लगे। बाद में वे कारखानों में भी काम करने लगे। 1978 में पंजाब में प्रवासी मजदूरों की संख्या 2.18 लाख थी जो अब कई गुना बढ़ गई है। 2016 में शिअद-भाजपा सरकार की प्रवासी विंग की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार उस समय प्रवासियों की अनुमानित आबादी 39 लाख थी।
शिअद के प्रवासी विंग के अध्यक्ष राम चंदर यादव के बयान के मुताबिक पिछले कुछ सालों में यह संख्या बढ़कर लगभग 43 लाख हो गई है। पूर्वांचल प्रवासी संगठन के अनुसार भी पंजाब में 43 लाख प्रवासी रहते हैं। यह आबादी सबसे ज्यादा लुधियाना, जालंधर, अमृतसर, मोहाली, बठिंडा, फगवाड़ा और होशियारपुर में रहती है। अकेले औद्यौगिक शहर लुधियाना में करीब सात लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं।
प्रवासी मजदूर (फाइल फोटो)
- फोटो : Amar Ujala
लॉकडाउन में करीब 18 लाख श्रमिक गृह राज्य लौटना चाहते थे
मार्च 2020 में, जब कोरोना की पहली लहर आई और लॉकडाउन लगा तो देश भर से प्रवासी मजदूर और कामगार अपने घर लौटने लगे। पंजाब से भी श्रमिक ट्रेनें चलीं और करीब 18 लाख श्रमिकों ने अपने मूल राज्यों में लौटने के लिए पंजाब सरकार के पास पंजीकरण कराया। इनमें से करीब 10 लाख उत्तर प्रदेश और 6 लाख बिहार वापस जाना चाहते थे। बाकी पश्चिम बंगाल, ओडिशा और मध्य प्रदेश के अपने मूल राज्य में लौटना चाह रहे थे। हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक इन पंजीकृत प्रवासियों में से केवल 5.64 लाख ही वास्तव में अपने गृह राज्य वापस गए।
पंजाब की अर्थव्यवस्था में योगदान क्या?
पंजाब की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। 2018-19 में पंजाब के सकल घरेलू उत्पाद में 25 फीसदी हिस्सा कृषि क्षेत्र का था। पंजाब यूनिवर्सिटी पटियाला की ‘चेंजिंग कैरेक्टर ऑफ रूरल इकोनॉमी एंड मारग्रेंट लेबर इन पंजाब’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हरित क्रांति की शुरुआत की अवधि में तेजी से कृषि क्षेत्र में वृद्धि हुई और पंजाब को समृद्ध करने में इसका महत्व बढ़ा। कृषि क्षेत्र के उत्पादन और उत्पादकता में न केवल वृद्धि हुई और राज्य की अर्थव्यवस्था में इस क्षेत्र का योगदान बढ़ा बल्कि देश में प्रति व्यक्ति आय के मामले में शीर्ष पर रहा।
रिपोर्ट के मुताबिक यह मुख्य रूप से इस वजह से हुआ क्योंकि पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई थी। उच्च मजदूरी दर और रहने के अनुकूल माहौल के कारण अन्य राज्यों से वे श्रम शक्तियां यहां आने के लिए आकर्षित हुईं जो बेहतर कमाई की तलाश में थी। इससे पंजाब के शहरी और ग्रामीण इलाको में प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ी।
बुआई से लेकर कटाई तक सब करते हैं
यहां के मूल निवासियों के खेतों में बड़ी संख्या में उत्तर प्रदेश और बिहार के रहने वाले प्रवासी मजदूर काम करते हैं। वे बुआई से लेकर कटाई तक का सारा काम करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पंजाब में करीब आठ लाख प्रवासी श्रमिक कृषि गतिविधियों में शामिल हैं, जिनकी आमदनी 2,500 से 3,600 रुपये प्रति एकड़ है। हालांकि फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2004-05 और 2011-12 के बीच, राज्यों में कार्यबल का एक बड़ा हिस्सा कृषि से दूर चला गया।
पंजाब के खेत में किसान (फाइल फोटो)
- फोटो : (फाइल फोटो)
लॉकडाउन के दौरान कृषि क्षेत्र को लगा झटका
लॉकडॉउन के दौरान जब बड़ी संख्या में मजदूर अपने गृह राज्य चले गए तो पंजाब में मजदूरों की कमी पड़ गई और खेती-किसानी के कामों पर इसका असर पड़ा। जबकि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पंजाब के बड़े किसानों ने कई बसें भेजकर प्रवासी मजदूरों को उनके गांवों से वापस बुलाया और वे उच्च मेहनताना भी देने को तैयार थे।
पंजाब कृषि विभाग के क्रॉप कटिंग एक्सपेरिमेंट्स (सीसीई) के रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब में साल 2020 के मुकाबले नंवबर 2021 तक धान की खरीद में चार फीसदी की कमी देखी गई। वहीं धान की बुवाई के रकबे में भी पहले के मुकाबले लगभग पांच फीसदी की कमी आई। पंजाब की अर्थव्यवस्था पर महामारी एक झटके की तरह था। पंजाब सरकार के 2020-21 के आर्थिक सर्वे में कहा गया कि 2020-21 6.30% की वृद्धि दर के साथ इस झटके को कम करने के लिए कृषि क्षेत्र अब तैयार है।
करीब 20 लाख मजदूर हर साल पंजाब आते हैं
एक अनुमान है कि करीब 20 लाख मजदूर हर साल पंजाब आते हैं और वे आसानी से खेती के कामों से कुछ ही महीनों में 40 से 50 हजार की कमाई कर लेते हैं। पंजाब उद्योगों का भी एक बड़ा केंद्र हैं। जो प्रवासी मजदूर कृषि कार्यों में काम नहीं पाते हैं वे इन उद्योगों में काम करते हैं। पंजाब होजरी का भी बड़ा बाजार माना जाता है, जिसमें भी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर काम करते हैं। ये प्रवासी मजदूर इमारतें बनाने से लेकर फल-सब्जी बेचने, ढाबे चलाने और पेट्रोल पंप हर जगह काम करते हैं।
इस तरह पंजाब की अर्थव्यवस्था और वहां के विकास में मजदूरों का बहुत योगदान माना जाता है। बताया जाता है कि पिछले साल तीन कृषि कानूनों को लेकर जब पंजाब के कई किसान दिल्ली में आंदोलन कर रहे थे तब उनके पीछे से प्रवासी मजदूरों ने ही उनके खेत-खलिहान को संभाला।
पंजाब विधानसभा चुनाव 2022
- फोटो : फाइल फोटो
पंजाब की राजनीति पर कितना प्रभाव?
जब इतनी बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर यहां काम के लिए जाने लगे तो धीरे-धीरे वहां बसना भी शुरू कर दिया। अब पंजाब की राजनीति पर भी उनका साफ प्रभाव देखा जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लॉकडाउन के दौरान जो प्रवासी श्रमिक अपने गृह राज्य लौट गए थे उनमें से ज्यादतर चुनाव से पहले पंजाब लौट आए हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक 2017 के विधानसभा चुनाव के समय करीब 27 लाख वोट प्रवासी मजदूरों के थे।
पंजाब में सबसे ज्यादा प्रवासी वोटर साहनेवाल विधानसभा क्षेत्र में हैं। यहां प्रवासियों की आबादी करीब 50,000 से ज्यादा है। लुधियाना में, लगभग 5 वार्डों में बहुसंख्यक प्रवासी आबादी है। फतेहगढ़ साहिब, जालंधर, अमृतसर, बठिंडा, फगवाड़ा, होशियारपुर इलाकों में भी इनका असर है, लेकिन सबसे ज्यादा असर लुधियाना में है।
पंजाब की राजनीति में प्रवासियों का दखल बढ़ा
इस लिहाज से प्रवासियों का पंजाब की राजनीति में भी दखल बढ़ा है और प्रवासी वोट की भूमिका अहम हो गई है। हर चुनाव में तमाम राजनीतिक दलों के नेता इन प्रवासी लोगों को 'वोट बैंक' मानते हैं और उन्हें ध्यान में रखते हुए कई चुनावी वादे करते हैं। इसी वजह से चुनाव में प्रचार सामाग्री हिंदी में भी छापने और नेताओं के हिंदी में भाषण देने का भी चलन बढ़ा है। लगभग सभी पार्टियां प्रवासी मजदूरों का वोट हासिल करने के लिए जोड़-तोड़ कर रही हैं।
प्रवासियों के वोट हासिल करने के लिए राजनीतिक दल अक्सर भोजपुरी सितारे और प्रवासी राज्यों के लोकप्रिय राजनेताओं को भी बुलाते हैं। इस साल भाजपा नेता और गायक मनोज तिवारी चुनाव प्रचार के लिए मोहाली, होशियारपुर गए थे। जबकि पहले शत्रुघ्न सिन्हा जैसे अभिनेता भी चुनाव प्रचार के दौरान यहां आ चुके थे। प्रवासी भी अब चाहते हैं कि राजनीतिक दल उन्हें प्रतिनिधित्व दें।