लोकसभा सचिवालय के असंसदीय शब्दों की जिस नई बुकलेट पर सियासी घमासान मचा है, वह न तो बाध्यकारी है और न ही सलाह। लोकसभा सचिवालय दुनिया भर के देशों के विधानमंडलों और देश की विधानसभाओं में घोषित किए गए असंसदीय शब्दों का हर साल संकलन कर इसे बुकलेट के रूप में जारी करता है। इस नई बुकलेट में कई ऐसे शब्द हैं, जो राज्यों की विधानसभाओं, दूसरे देशों के विधानमंडलों में असंसदीय शब्दों की सूची में पहले से शामिल हैं।
संविधान विशेषज्ञ और लंबे समय तक लोकसभा के महासचिव रहे सुभाष कश्यप ने इसे बिना वजह का विवाद बताया। उन्होंने कहा, यह हर साल चलने वाली प्रक्रिया है। सदन में की गई टिप्पणियों के संदर्भ में अंतिम फैसला पीठासीन अधिकारी का होता है।
अंत में वही फैसला करते हैं कि कौन सा शब्द कार्यवाही का हिस्सा होगा और कौन सा नहीं। यह भी समझा जाना चाहिए कि इस सूची में बदलाव भी होता रहा है। इसके कई उदाहरण हैं। ऐसे में बुकलेट को लेकर इस स्तर पर जताया जा रहा विरोध समझ से परे है।
2015 में नाथूराम गोडसे नाम प्रतिबंधित हुआ
ऐसा भी नहीं है कि असंसदीय शब्दों की सूची में बदलाव नहीं होता। मसलन देश की संसद में साल 1956 से गोडसे शब्द असंसदीय शब्दों की सूची में शामिल था। साल 2015 में जब राज्यसभा के तत्कालीन उपसभापति पीजे कुरियन ने एक सदस्य को इस शब्द का इस्तेमाल करने से रोका तो इसे शिवसेना सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे ने मुद्दा बनाया।
सांसद का उपनाम होने से बदलाव
उन्होंने लोकसभा की तत्कालीन स्पीकर सुमित्रा महाजन को पत्र लिखकर कहा कि गोडसे उपनाम होना मेरी गलती नहीं है। मैं अपने नाम से यह शब्द नहीं हटाऊंगा। बाद में स्पीकर ने गोडसे को असंसदीय शब्दों की सूची से हटा दिया और व्यवस्था दी कि नाथूराम गोडसे का पूरा नाम ही प्रतिबंधित माना जाएगा।
विवाद बेमतलब : 1952 से जारी है सिलसिला
नई बुकलेट पर विपक्ष की आपत्तियों को लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने आधारहीन और तथ्यों को जाने बिना तूफान पैदा करने की कोशिश बताया। आधिकारिक सूत्र ने कहा कि इसमें ज्यादातर वही शब्द हैं, जो पिछली सरकारों में भी असंसदीय थे। यह सिलसिला साल 1954 से चला आ रहा है।
इस बार 62 नए शब्द जोड़े हैं, जो विधानसभाओं, दूसरे देशों के विधानमंडलों से भी लिए हैं। इनमें से कुछ की समीक्षा की जा सकती है। सूची हर साल आती है। विरोध करने वालों को पता होना चाहिए कि बुकलेट केवल शब्दों का संकलन है। यह सुझाव या आदेश नहीं है।
सूची में विधानसभाओं में प्रतिबंधित कई शब्द भी
असंसदीय शब्द की बुकलेट में कई नए शब्द शामिल किए गए हैं। विपक्ष मुख्यतौर पर जुमलेबाजी शब्द को सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज करा रहा है, जिसका प्रयोग अक्सर वह प्रधानमंत्री के खिलाफ करता रहा है। जबकि इस बुकलेट में उन राज्यों की विधानसभाओं में असंसदीय घोषित किए गए कई शब्द भी शामिल किए गए हैं, जहां विपक्ष की सरकारें हैं।
मसलन बुकलेट में पंजाब विधानसभा द्वारा असंसदीय घोषित शब्द लॉलीपॉप, झूठा, छत्तीसगढ़ विधानसभा के अंट शंट, अक्षम, राजस्थान विधानसभा के अनपढ़, अनर्गल भी शामिल हैं।
बचाने की कोशिश में तार-तार हुई मर्यादा
असंसदीय शब्दों की बुकलेट के जरिये कोशिश तो संसद में बेहतर मर्यादा बनाने की थी, मगर नई सूची ने सारी मर्यादा ही तार-तार कर दी। विपक्ष ने मुख्य रूप से पीएम पर निशाना साधा। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि चाहे उन्हें निलंबित कर दिया जाए, मगर वह सदन में इन शब्दों का प्रयोग करेंगे।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर कहा, विपक्ष द्वारा मोदी सर की वास्तविकता का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किए गए सभी शब्द अब असंसदीय माने जाएंगे। आगे क्या विषगुरु? वहीं, इसी पार्टी के महासचिव ने व्यंग्यात्मक ट्वीट में कहा, साहेब अपने गुणों को अच्छी तरह जानते हैं।
कांग्रेस ने भी ट्वीट किया कि जुमलाजीवी से कौन डरेगा-जुमला जिसने दिया। जयचंद शब्द से कौन डरेगा-जिसने देश को धोखा दिया है। इन शब्दों को संसद में बैन नहीं किया जा रहा है, पीएम मोदी का डर बाहर आ रहा है।
कोई शब्द प्रतिबंधित नहीं भ्रम नहीं फैलाएं : बिरला
असंसदीय शब्दों की नई बुकलेट पर विपक्ष के हंगामे को स्पीकर ओम बिरला ने निराधार बताते हुए भ्रम पैदा न करने की अपील की है। उन्होंने कहा, एक भी शब्द को प्रतिबंधित नहीं किया गया है। सचिवालय 1954 से असंसदीय शब्दों की बुकलेट तैयार करता आ रहा है।
इसमें ऐसे शब्दों को शामिल किया जाता रहा है, जिन्हें पीठासीन अधिकारी कार्यवाही से हटाते रहे हैं।
शब्दों पर प्रतिबंध का आरोप लगाने वालों को संसदीय परंपरा की जानकारी नहीं है। असंसदीय शब्दों का 1100 पन्नों का एक बड़ा शब्दकोष है। साल 2009 से इसे हर साल जारी किया जा रहा है। शब्दों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगा सकता।
शब्द नहीं संदर्भ महत्वपूर्ण
स्पीकर ने कहा, चर्चा में शब्द नहीं बल्कि शब्द का संदर्भ महत्वपूर्ण है। कोई भी शब्द किस संदर्भ में बोला गया है, वह मायने रखता है। भविष्य में कोई असंसदीय शब्द का उपयोग करते हैं तो यह निर्भर करता है उसका उपयोग किस संदर्भ में किया जा रहा है। अगर गलत संदर्भ में किया गया तो पीठासीन अधिकारी कार्यवाही से हटाने का निर्देश दे सकते हैं।