कुछ दिनों पहले ही उच्चतम न्यायालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (पीएसयू) एनबीसीसी को आम्रपाली के प्रोजेक्ट को पूरा करने का आदेश दिया था। अब यह पीएसयू एक और रीयल एस्टेट कंपनी यूनिटेक के 74 प्रोजेक्ट को पूरा करेगी क्योंकि इससे 17,000 खरीददारों पर असर पड़ रहा है। अदालत का कहना है कि यह कंपनी अपने वादों को पूरा करने में अक्षम है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से हस्तक्षेप करते हुए खरीददारों के हितों की रक्षा करने के लिए कहा है।
अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ और एमआर शाह की पीठ को बताया कि एनबीसीसी अधूरे प्रोजेक्टों को कंसल्टेंट के तौर पर टेक ओवर करने के लिए तैयार है। उन्होंने अदालत में एनबीसीसी के प्रस्ताव को पेश किया जिसमें उसका कहना है कि यदि फंड दिए जाएं तो वह प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए तैयार है। हालांकि पीएसयू ने अपना पैसा निवेश करने से मना कर दिया है।
एनबीसीसी चाहता है कि उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज और एक वरिष्ठ नौकरशाह और टेक्नोक्रेट के नेतृत्व में उच्चाधिकार प्राप्त समिति बनाई जानी चाहिए। प्रस्ताव में कहा गया है कि पैनल एनबीसीसी के साथ एक एमओयू करेगा जिसके बाद पीएसयू अधूरे प्रोजक्टों का प्रारंभिक अध्ययन करके समय और खर्च बताएगी। यूनिटेक के प्रबंध संचालक संजय चंद्रा और उनके भाई अजय चंद्रा अगस्त 2017 से जेल में हैं। उन्हें दिल्ली पुलिस ने फ्लैटों का पजेशन देने में असफल रहने की वजह से गिरफ्तार किया है।
समूह ने अब तक शीर्ष अदालत में और अदालत द्वारा नियुक्त संपत्ति की बिक्री करने वाली समिति के पास 464 करोड़ रुपये जमा करवाए हैं। चंद्रा ने अदालत से जमानत मांगी जिसे की नामंजूर कर दिया गया। प्रस्ताव को ऑन रिकॉर्ड लेते हुए न्यायालय की पीठ ने खरीददारों से एनबीसीसी के प्रस्ताव पर सुझाव मांगे हैं। 9 अगस्त को सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत आदेश देगी। प्रस्ताव के अनुसार एनबीसीसी बिल्डर-खरीदार समझौते के अंतर्गत हर प्रोजेक्ट का एक सैंपल फ्लैट तैयार करेगी और उच्चतम न्यायालय की समिति से इसकी मंजूरी लेगी।