केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को यूपी की कमान मिल सकती है। वह राज्य के नये मुख्यमंत्री के रूप में जल्द शपथ ले सकते हैं। हालांकि तीन बार पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और 17 साल से केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय राजनाथ सिंह यूपी के मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी के लिए इच्छुक नहीं हैं, लेकिन सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन राव भागवत की मुहर लगने के बाद वह इसे कुबूल कर लेंगे। प्राप्त जानकारी के अनुसार कोएम्बटूर में इसके लिए मंथन जारी है।
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यूपी में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को 325 सीटें मिली है। जनता का इतना बड़ा जनादेश भाजपा के लिए जितनी बड़ी खुशियों की सौगात लाया है, वहीं 2019 के आम चुनाव को देखते हुए उतने ही असमंजस में डाल रहा है। इसलिए भाजपा और संघ दोनों जनता के इस भरोसे को खोना नहीं चाहते। सूत्र बताते हैं कि यही वजह कि कई दौर की बैठकों के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और अन्य अन्य शीर्ष नेता एक राय पर नहीं पहुंच पा रहे हैं। इस कड़ी में केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अनुभव, राजनीतिक कुशलता, प्रशासनिक दक्षता और सभी को साधने की कला में यूपी के सभी नेताओं पर भारी हैं।
क्या है राजनाथ का संकोच
केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ भाजपा के कद्दावर नेताओं में हैं। वह प्रधानमंत्री मोदी जी की कैबिनेट में दूसरे नंबर की हैसियत रखते हैं। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में केन्द्रीय कृषि मंत्री थे। तीन बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं। 17 साल से भाजपा की केन्द्रीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। पिछले दस साल से केन्द्रीय राजनीति की धुरी रहे हैं।
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इसके अलावा वह यूपी के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्य की राजनीति से ऊपर उठकर केन्द्र की राजनीति में आए हैं। इसलिए केन्द्रीय गृहमंत्री के लिए राज्य में लौटकर मुख्यमंत्री बनना, राज्य स्तर की राजनीति में सक्रिय होना, और मायावती, अखिलेश के समकक्ष की राजनीति में उतरना संकोच पैदा कर रहा है। लेकिन माना यह जा रहा है कि संघ और भाजपा के अनुशासित सिपाही राजनाथ सिंह शीर्ष नेतृत्व द्वारा लिए गए किसी भी निर्णय का अंतत: सम्मान करेंगे।
चर्चा में हैं और भी नाम
योगी आदित्यनाथ
गोरक्षापीठाधीश्वर और गोरखपुर के सांसद योगी आदित्य नाथ भी यूपी के मुख्यमंत्री पद की रेस में हैं। गोरखपुर मंडल में अच्छी राजनीतिक पकड़ रखते हैं। कठोर हिन्दुत्व का चेहरा हैं लेकिन योगी को सरकारी कामकाज और प्रशासनिक मामलों का अनुभव कम है। इसके अलावा योगी एक खास किस्म की पहचान में बंध चुके हैं। वह भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा तैयार की गई सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले में भी कितना फिट बैठ पाएंगे, कहा नहीं जा सकता। हालांकि मान-सम्मान, कौशल और लोगों में छाप छोड़ने की कला में योगी का कोई सानी नहीं है।
मनोज सिन्हा
बीएचयू की छात्र राजनीति से ख्यातिलब्ध हैं। केन्द्र सरकार में रेल राज्य मंत्री और दूर संचार मंत्री स्वतंत्र प्रभार हैं। प्रशासनिक समझ कूट-कूटकर भरी है। व्यवहार कुशल मनोज सिन्हा को न केवल राजनीति का अच्छा ज्ञान है, बल्कि टेक्नोक्रेट सिन्हा पूर्वांचल से लेकर गाजियाबाद तक का भौगोलिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक रुप से अच्छी तरह समझते हैं। गैर विवादित चेहरा हैं और मुख्यमंत्री की रेस में प्रमुखता से शामिल हैं।
केशव प्रसाद मौर्य
केशव प्रसाद मौर्य
विश्व हिन्दू परिषद के जीवन समर्पित कर देने वाले सांसद और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य बहुत व्यवहार कुशल हैं। संघठनात्मक क्षमता के धनी हैं। अन्य पिछड़ी जाति से आते हैं, लेकिन सरकारी कामकाज के अनुभव में पिछड़ रहे हैं। केशव प्रसाद मौर्य के खिलाफ कुछ आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। यह उनके गले की फांस बन रहे हैं। प्रधामंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह दोनों चाहते हैं कि मौर्य को यूपी में सफलता पाने का ईनाम दिया जाना चाहिए, लेकिन उनके खिलाफ चल रहे अदालती मामलों को लेकर शीर्ष नेतृत्व को कुछ संकोच हो रहा है। माना जा रहा है कि पार्टी आने वाले समय में सुचिता की राजनीति को लेकर कोई खतरा नहीं मोल लेना चाहती।
सतीश महाना
कानपुर से विधायक का चुनाव जीते हैं। क्षेत्र में अच्छी पकड़ रखने वाले निर्विवादित नेता हैं। लगातार छह बार विधायक रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि विशेष विमान से दिल्ली बुलाये गए थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खुद उन्हें लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलवाने गए थे। महाना और प्रधानमंत्री का परिचय और रिश्ता काफी पुराना है। सहाना में संगठनात्मक क्षमता कूट-कूट कर भरी है। यूपी सीएम के लिए सतीश महाना का नाम भी काफी प्रमुखता से चर्चाओं में है।
महेश शर्मा और दिनेश शर्मा समेत कई और नामों की चर्चा
महेश शर्मा
केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा मिलनसार, प्रशासनिक क्षमता का अनुभव रखने वाले, संगठनात्मक दृष्टि से मजबूत और ठीक-ठाक पकड़ रखने वाले नेता हैं। प्रधानमंत्री मोदी की कैबिनेट में उन्हें पीएम का अच्छा विश्वासपात्र माना जाता है। लेकिन राजनीति के अनुभव और गाजियाबाद से लेकर गोरखपुर तक की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक समझ, अनुभव आड़े आ सकती है।
दिनेश शर्मा
दिनेश शर्मा एक अच्छा राजनीतिक चेहरा हैं। गैर विवादित व्यक्तित्व हैं और प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के विश्वासपात्र हैं। कामकाज के मामले में भी कठिन परिश्रमी और लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं, लेकिन यूपी में 2019 में होने वाले आम चुनाव को देखते हुए पार्टी को काफी कुछ सोचना पड़ रहा है। हालांकि महेश शर्मा और दिनेश शर्मा भी मुख्यमंत्री पद की रेस में प्रमुखता से हैं।
श्रीकांत शर्मा
मुख्यमंत्री पद की रेस में श्रीकांत शर्मा का भी नाम लिया जा रहा है। शर्मा वित्त मंत्री अरुण जेटली के करीबी भी हैं। पार्टी प्रवक्ता के तौर पर काफी सफल रहे हैं। मथुरा विधानसभा सीट से जीतकर आए हैं, लेकिन सरकारी कामकाज और प्रशासनिक अनुभव बड़ी बाधा बन सकता है।
सूत्र बताते हैं कि 15 मार्च की सुबह तक यूपी और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के नाम पर मुहर लग जाने की संभावना है। ताकि पार्टी जल्द ही नाम का ऐलान करके सरकार बनाने की प्रक्रिया को तेजी से शुरू कर सके।