प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी कैबिनेट में जो अहम बदलाव किए हैं, उसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका बढ़ गई है। नए सहकारिता मंत्रालय की कमान शाह को सौंप दी गई है। जानकारों का कहना है कि अमित शाह अपने जीवन की सबसे मुश्किल परीक्षा में बैठ रहे हैं। उनके सामने किसान आंदोलन को साधना है। किसी भी तरह से किसानों को समझाकर आंदोलन खत्म कराना है। इसके बाद 2022 में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड और गुजरात जैसे बड़े राज्यों में विधानसभा चुनाव भी हैं। उनकी जिम्मेदारी यहीं पर खत्म नहीं हो जाती। जिस तरह से पीएम मोदी ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक अतिरिक्त राज्य मंत्री दिया है, उससे यह बात साफ हो जाती है कि अमित शाह अब दूसरी कई जिम्मेदारियों को निभाने जा रहे हैं। गृह मंत्रालय में अब उनके पास तीन सहयोगी मंत्री हो गए हैं। संभव है कि वे राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होकर 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी को मजबूत करेंगे।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जब अमित शाह पार्टी की कमान संभाले हुए थे, तो पार्टी का ग्राफ तेजी से बढ़ा था। कई राज्यों में पार्टी की सरकार बनी थी। 2019 में जब भाजपा को दोबारा सत्ता मिली तो अमित शाह को केंद्रीय गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने जैसा बड़ा कदम उठाया। इसके अलावा एनआईए कानून में संशोधन कर जांच एजेंसी को अधिक शक्तियां दे दी गई। सीएए और एनआरसी को लेकर उन्हें विपक्ष और सिविल सोसायटी के लोगों की आलोचना झेलनी पड़ी।
कोरोनाकाल के दौरान शाह ने दिल्ली में दो बार मोर्चा संभाला। शाह के सामने बड़ी चुनौती किसान आंदोलन रहा है। उन्होंने खुद किसानों से बात की है, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हो सका। अब धीरे धीरे यह आंदोलन भाजपा और केंद्र सरकार के गले की फांस बनता जा रहा है। किसान संगठनों के नेताओं ने घोषणा कर दी है कि यूपी चुनाव में भाजपा को हराने के लिए वे हर संभव प्रयास करेंगे। हरियाणा, पंजाब और यूपी के कुछ इलाकों में भाजपा नेताओं को काले झंडे दिखाए जा रहे हैं। मंत्रियों को उद्घाटन समारोह तक टालने पड़ रहे हैं। अगले साल यूपी सहित कई राज्यों में चुनाव है। अगर दो तीन माह में किसान आंदोलन को खत्म नहीं कराया तो भाजपा को बड़ी मुसीबतें झेलनी पड़नी सकती हैं।
अमित शाह के गृह मंत्रालय में अब तीन मंत्री हो गए हैं। उनके लिए कामकाज में आसानी रहेगी। वे अपना ध्यान पार्टी के कार्यों पर भी लगा सकेंगे। पीएम मोदी ने उन्हें सहकारिता मंत्रालय भी सौंपा है। चूंकि यह मंत्रालय किसान आंदोलन से ही जुड़ा है, इसलिए शाह को इस पर विशेष ध्यान देना होगा। उनके सामने एक बड़ी चुनौती रहेगी कि वे किसानों को प्रशासनिक, कानूनी और नीतिगत ढांचे के अंतर्गत किस तरह से समझाने में कामयाब हो पाते हैं। उन्हें किसानों को साथ लेकर सहकारिता आधारित आर्थिक विकास मॉडल को आगे बढ़ाना है। सहकारी समितियों का महत्व और बिचौलियों की भूमिका, शाह को ये बात किसानों को समझानी है। केंद्र सरकार के एक अधिकारी का कहना है कि बहुत जल्द किसानों और सरकार के बीच बातचीत दोबारा से शुरु हो सकती है।
इस बार बातचीत का खाका अमित शाह तैयार करेंगे। अमित शाह जिस राज्य से आते हैं, वहां पर सफल सहकारी आंदोलनों का इतिहास रहा है। 1946 में स्थापित अमूल का उदाहरण दुनिया के सामने है। उस दौर में गुजरात के किसानों ने सरदार पटेल से आग्रह किया था कि उन्हें बिचौलियों से छुटकारा दिलाया जाए। सहकारी समिति की अवधारणा तभी जमीनी स्तर पर बाहर आई थी। शाह को अपने नए मंत्रालय के जरिए किसानों को भरोसा दिलाना होगा कि नए कृषि कानूनों के बाद देश के अन्य हिस्सों में भी किसानों की आय और भूमि की उत्पादकता में वृद्धि होगी। चूंकि मोदी सरकार बहु-राज्य सहकारी समितियों के विकास के लिए प्रतिबद्ध है, इसलिए किसानों को हर संभव सहायता प्रदान करेगी। सहकारिता के लिए 'व्यापार करने में आसानी' को और अधिक कारगर बनाया जाएगा। ये सब अमित शाह की नई चुनौतियों में शामिल हैं।