वित्त मंत्री अरूण जेटली के जरिए वर्ष 2018-19 के लिए पेश आम बजट को बेशक किसान और ग्रामीण क्षेत्रों का हितैषी करार दिया जा रहा है। मगर कृषि अर्थशास्त्री से लेकर किसान नेताओं तक की राय में जेटली के इस बजट में पहले की ही तरह जुमलेबाजी की भरमार है। देश के जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा का कहना है कि आम बजट में किसानों के लिए बातें ज्यादा हैं और काम कम किए गए हैं। किसानों की दशा सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने के बजाय वित्त मंत्री ने आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए किसानों को लागत मूल्य से डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिए जाने का सब्जबाग दिखाया है।
अमर उजाला से बातचीत में उन्होंने कहा कि आम बजट में सरकार ने गरीबों और किसानों के हित की महज बात की है। लेकिन इनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए ठोस कुछ नहीं किया है। शर्मा ने कहा कि सरकार के सबका साथ सबका विकास की नीति का रास्ता कृषि और ग्रामीण भारत से होकर गुजरता है। लेकिन इसपर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा कि 60 करोड़ से ज्यादा लोग खेतीबाड़ी से जुड़े हुए हैं। उम्मीद जताई जा रही थी कि चुनाव से पहले के इस अंतिम बजट में सरकार इनकी सुध लेगी। मगर आम बजट में ऐसा कुछ नजर नहीं आया। उधर किसान नेता शिव कुमार शर्मा उर्फ कक्का जी ने भी सरकार के कृषि हितैषी बजट के दावों को खारिज किया है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य डेढ़ गुना करने की कवायद छलावा
किसान नेता शिव कुमार शर्मा ने आम बजट को चुनावी और धूर्ततापूर्ण करार दिया है। बजट में किसानों को लॉलीपाप दिखाने का नया तरीका पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि भाजपा ने लोकसभा 2014 के चुनाव घोषणापत्र में उपज की लागत का डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य देने की बात की थी। मगर चार साल बाद पेश बजट में यह बात तो की गई है कि नीति आयोग और राज्य आयोग चर्चा कर इसपर निर्णय लेंगे। मगर बजट में इसके लिए राशि का प्रावधान नहीं किया गया है।
इससे पहले इसी केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में न्यायालय में शपथ पत्र देकर लागत मूल्य से डेढ़ गुना ज्यादा एमएसपी देने से इंकार किया है। एमएसपी के नाम पर किसानों को गुमराह करने की कवायद हो रही है। तो कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा ने भी सरकार के जरिए एमएसपी बढ़ाए जाने की कवायद को एक नया जुमला करार दिया है। उनका कहना है कि वित्त मंत्री ने रबी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य पहले ही डेढ़ गुना कर दिए जाने की बात की है। और अब उन्होंने खरीफ फसलों पर लागत मूल्य का डेढ़ गुना करने की बात की है।
बतौर शर्मा यदि सरकार ने वाकई में रबी फसलों का एमएसपी बढ़ा दिया होता तो अब तक ढिढ़ोरा पीट रही होती। और किसानों को भी इस बात का अहसास रहता। उन्होंने कहा कि आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए सरकार ने एमएसपी को लेकर माहौल बनाने की कोशिश की है। शर्मा के अनुसार सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को पूरा नहीं बल्कि उसके एक छोटे हिस्से को माना है। उन्होंने कहा कि लागत मूल्य निर्धारण करने के लिए कृषि लागत+पारिवारिक मजदूरी (ए2+एफएल) फार्मूले को आधार माना जा रहा है। इस फार्मूले के जरिए कर्नाटक के चना उत्पादक किसानों की लागत प्रति क्विंटल 6000 रूपया है जबकि सरकार ने चने का एमएसपी 4400 रूपया तय कर रखा है। तो ऐसे में सरकार ने कहां से और कैसे किसानों को लागत मूल्य का डेढ़ गुना एमएसपी दे दिया है।