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UCC: भारतीय संविधान में कैसे शामिल की गई थी समान नागरिक संहिता, संविधान सभा में इसे लेकर किसने क्या कहा?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Wed, 07 Feb 2024 04:49 PM IST

सार

Uniform Civil Code: संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता के बारे में प्रावधान हैं। दरअसल, संविधान निर्माताओं ने  संविधान सभा में इसकी प्रासंगिकता पर व्यापक विचार-विमर्श बहस की थी। अनुच्छेद 44 को संविधान सभा ने 23 नवंबर 1948 को बहस के बाद अपनाया था।
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समान नागरिक संहिता। - फोटो : NBPGR
देश में इन दिनों एक बार फिर समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज हो गई है। हालिया बहस की वजह उत्तराखंड का प्रस्तावित समान नागरिक संहिता कानून है। दरअसल, राज्य की विधानसभा में मंगलवार को इससे जुड़ा विधेयक पेश किया था जिसे बुधवार को सदन से मंजूरी मिल सकती है। 

भले ही यह कानून उत्तराखंड में लागू होने जा रहा है लेकिन इसको लेकर राजनीति देशभर में हो रही है। एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी समेत कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है। इस कानून के केंद्र में संविधान का अनुच्छेद 44 है। इसे लागू करने के लिए संविधान में राज्य को शक्ति दी गई थी। 


ऐसा नहीं है कि समान नागरिक संहिता का आज विरोध हो रहा है। संविधान सभा में भी इसको लेकर खूब बहस हुई थी। इस दौरान कई लोगों ने इसका विरोध किया था तो कई लोग इसके पक्ष में खड़े थे। आइये जानते हैं हमारे संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता पर क्या बहस की थी? किसने इसका समर्थन किया था? कानून के विरोध में कौन था? 
 
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समान नागरिक संहिता। - फोटो : NBPGR
देश में इन दिनों एक बार फिर समान नागरिक संहिता को लेकर बहस तेज हो गई है। हालिया बहस की वजह उत्तराखंड का प्रस्तावित समान नागरिक संहिता कानून है। दरअसल, राज्य की विधानसभा में मंगलवार को इससे जुड़ा विधेयक पेश किया था जिसे बुधवार को सदन से मंजूरी मिल सकती है। 

भले ही यह कानून उत्तराखंड में लागू होने जा रहा है लेकिन इसको लेकर राजनीति देशभर में हो रही है। एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी समेत कई मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध किया है। इस कानून के केंद्र में संविधान का अनुच्छेद 44 है। इसे लागू करने के लिए संविधान में राज्य को शक्ति दी गई थी। 

ऐसा नहीं है कि समान नागरिक संहिता का आज विरोध हो रहा है। संविधान सभा में भी इसको लेकर खूब बहस हुई थी। इस दौरान कई लोगों ने इसका विरोध किया था तो कई लोग इसके पक्ष में खड़े थे। आइये जानते हैं हमारे संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता पर क्या बहस की थी? किसने इसका समर्थन किया था? कानून के विरोध में कौन था? 
 

पहले जानते हैं कि देश में समान नागरिक संहिता की स्थिति क्या है?
समान नागरिक संहिता का अर्थ होता है भारत में रहने वाले हर नागरिक के लिए एक समान कानून हो, चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता लागू होने से सभी धर्मों का एक कानून होगा। शादी, तलाक और जमीन-जायदाद के बंटवारे में सभी धर्मों के लिए एक ही कानून लागू होगा। 

हमारे संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को लेकर प्रावधान हैं। इसमें कहा गया है कि राज्य इसे लागू कर सकता है। इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव या पक्षपात को खत्म करना है। इस अनुच्छेद को संविधान सभा ने 23 नवंबर 1948 को एक जोरदार बहस के बाद अपनाया था। 

समान नागरिक संहिता पर क्या बहस हुई थी?
देश में संविधान बनाने के लिए संविधान सभा गठित की गई थी। संविधान सभा की पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई। संविधान बनाने के दौरान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता की अवधारणा, प्रासंगिकता और उपयोगिता पर व्यापक विचार-विमर्श किया था। जहां संविधान सभा में मुस्लिम प्रतिनिधियों ने समान नागरिक संहिता का विरोध किया तो कई सदस्यों ने इसके पक्ष में तर्क दिया।

बहस के दौरान संविधान सभा में पर्सनल लॉ को लेकर व्यापक चर्चा हुई थी। दिलचस्प है कि मौजूदा समय में समान नागरिक संहिता अनुच्छेद 44 के तहत आती है लेकिन संविधान सभा ने अनुच्छेद 35 के तहत इस पर चर्चा की थी।

कानून के विरोध में कौन था? 
मद्रास से आने वाले सदस्य मोहम्मद इस्माइल ने अनुच्छेद 35 में एक संशोधन का प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गया कि किसी भी समूह, वर्ग या लोगों के समुदाय को अपने व्यक्तिगत कानून को छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए, यदि उसके पास कोई व्यक्तिगत कानून है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी के व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना एक मौलिक अधिकार है और ये कानून लोगों की जीवन शैली का अभिन्न हिस्सा हैं।

इस्माइल का मानना था कि व्यक्तिगत कानूनों में कोई भी हस्तक्षेप उन लोगों की जीवनशैली में हस्तक्षेप करने के जैसे होगा जो पीढ़ियों से इन कानूनों का पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने तर्क रखा कि चूंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में विकसित हो रहा है, इसलिए उसे ऐसे कार्यों से बचना चाहिए जो उसके लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक लोकाचार को बाधित कर सकते हैं। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने यूगोस्लाविया, सर्बिया, क्रोएशिया और स्लोवेनिया के उदाहरणों का हवाला दिया। इसके अलावा उन्होंने अल्पसंख्यकों से जुड़े अन्य यूरोपीय संविधानों का भी उल्लेख किया।

संविधान सभा के सदस्य एमए अयंगर ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया। अयंगर ने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा सभी धर्मों को समान सम्मान और गरिमा के साथ समायोजित करती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में विभिन्न समुदायों को अपने धर्म और संस्कृति का पालन करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। अयंगर के अनुसार, लोगों को अपने व्यक्तिगत कानून का पालन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

संविधान सभा के महबूब अली बेग ने बहस में हिस्सा लिया। बेग का तर्क था कि अनुच्छेद 35 में उल्लिखित नागरिक संहिता में पारिवारिक कानून और विरासत शामिल नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि यह स्पष्ट करने के लिए एक प्रावधान जोड़ा जाए कि नागरिक संहिता संपत्ति हस्तांतरण और अनुबंध जैसे मामलों को विनियमित करेगी न कि व्यक्तिगत कानूनों को।

इसके अलावा कई अन्य सदस्यों ने धार्मिक कानूनों में हस्तक्षेप करने के संविधान सभा के अधिकार पर सवाल उठाया। उनका मानना था कि अनुच्छेद 35 धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है।

कानून के पक्ष में कौन था? 
जहां संविधान सभा के कई सदस्यों ने समान नागरिक संहिता को धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताया तो कई लोगों ने इससे इतर राय भी रखी थी। कांग्रेस सदस्य और संविधान सभा मसौदा समिति के सदस्य केएम मुंशी ने प्रस्तावित कानून के पक्ष में थे। केएम मुंशी ने कहा कि अनुच्छेद 35 के बिना भी संसद के लिए समान नागरिक संहिता बनाना कानूनी होगा। उन्होंने कहा था कि यह अनुच्छेद धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देने वाला है। अनुच्छेद 35 राज्य को धर्मनिरपेक्ष गतिविधियों को विनियमित करने का भी अधिकार देता है।

केएम मुंशी ने कहा कि तुर्की और मिस्र जैसे कुछ मुस्लिम देशों ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के व्यक्तिगत कानूनों की रक्षा नहीं की। यूरोपीय देशों में समान कानून थे जो अल्पसंख्यकों पर भी लागू होते थे। पर्सनल लॉ से धर्म को अलग कर देना चाहिए। 

संविधान सभा के सदस्य अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर ने केएम मुंशी का समर्थन किया। इसके साथ ही अय्यर ने संविधान सभा से समान नागरिक संहिता से जुड़े अनुच्छेद को मंजूरी देने का आग्रह किया।

संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अनुच्छेद 35 के तहत होने वाले संशोधनों को खारिज कर दिया। अंबेडकर ने विभिन्न समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में हस्तक्षेप करने के राज्य के अधिकार का बचाव किया। उन्होंने संविधान सभा के हिंदू सदस्यों के तर्कों का बचाव किया। इसके साथ ही अंबेडकर ने मुस्लिम सदस्यों को आश्वासन दिया कि यह प्रस्ताव एक 'शक्ति' पैदा कर रहा है न कि 'दायित्व'। 

अंबेडकर ने तर्क दिया कि विवाह और उत्तराधिकार से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों के कुछ मसलों को छोड़कर मानवीय संबंधों के लगभग हर पहलू के लिए समान कानून लागू थे। उन्होंने यह भी कहा कि इस बात पर बहस करने में बहुत देर हो चुकी है कि संहिता को लागू किया जाना चाहिए या नहीं, क्योंकि काफी हद तक इसे पहले ही लागू किया जा चुका है।

इसके अलावा अंबेडकर ने पुष्टि की कि भले ही समान नागरिक संहिता लागू हो, यह केवल उन लोगों पर लागू होगी जो इसके के लिए सहमत हैं। 
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