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अगर इस तरह ताज महल को कहीं शिफ्ट कर दिया जाए तो!

Wed, 16 May 2018 02:43 PM IST
बीबीसी
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अगर दिल्ली से आगरा जाएँ, तो ताज महल यमुना के दाईं तरफ पड़ता है। दिल्ली से जाने वालों को शहर के बीच से होकर गुजरना पड़ता है। अक्सर मुश्किल हो जाती है कि जाम लगा है।

क्या हो अगर ताज महल को उठाकर यमुना के इस पार रख दिया जाए?

आप यकीनन कहेंगे कि क्या बेतुकी बात है? किसी सैकड़ों साल पुरानी इतनी बड़ी इमारत को आखिर कैसे उठाकर यमुना के इस पार रखा जाएगा?

माना कि तकनीक ने काफी तरक्की कर ली है। इंसान चांद पर पहुंच चुका है और मंगल पर जाने की तैयारी में है। फिर भी ताज महल या ऐसी किसी इमारत को उठाकर दूसरी जगह रखना अब भी कमोबेश नामुमकिन है।

पर, हम आपसे कहें कि मिस्र में ऐसा कारनामा किया जा चुका है, तो?

नहीं यकीन आया न! यकीन मानिए, मिस्र में आज से आधी सदी पहले ऐसा कारनामा इंसान कर चुका है। जब करीब तीन हजार साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत को उठाकर दूसरी जगह ले जाकर उसी रूप में फिर से स्थापित कर दिया गया।

चलिए पूरा किस्सा तफ्सील से बताते हैं।
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मिस्र का यह ऐतिहासिक मंदिर

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abu simbel temple
दुनिया के हरेक कोने में तारीख सिमटी है। वक्त के थपेड़ों से ऐसी बहुत सी तारीखी चीजों के नामो-निशां मिट गए, लेकिन अभी भी दुनिया में हजारों ऐसी इमारतें और जगहें हैं, जो इंसानी सभ्यता के विकास के सबूत के तौर पर मौजूद हैं।

इन्हें आने वाली नस्लों के लिए संजोने का काम बरसों से चलता आ रहा है। दुनिया में ऐसी बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरें हैं जिन्हें अगर समय रहते बचाया नहीं गया होता तो शायद इतिहास का एक कीमती खजाना मिट्टी में मिलकर खत्म हो गया होता।

इतिहास का ऐसा ही एक खजाना मिस्र के लोगों ने यूनेस्को के सहयोग से खत्म होने से बचाया है और आज ये यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट यानी विश्व की धरोहरों की फेहरिस्त में शामिल है।

मिस्र का अबु सिम्बल मंदिर दक्षिणी मिस्र की प्राचीन घाटी नुबियन में पहाड़ काट कर बनाया गया है। मंदिर के अंदर की खूबसूरती देखते ही बनती है। मंदिर की छत से लेकर फर्श तक उस दौर के राजा फराओ रैमसेस द्वितीय की जंगों में मिली कामयाबियों के किस्से उकेरे गए हैं। दरअसल इस मंदिर का निर्माण इसी राजा ने करवाया था। मंदिर के बाहर भी फराओ के चार विशाल बुत बने हैं जिनका रुख सामने से बह रही नदी की ओर है।

इस मंदिर से नजर आने वाला नजारा विलक्षण है। अगर विएना हिस्टोरिक सेंटर, कम्बोडिया के अंकोरवाट या यूनेस्को की दीगर वर्ल्ड हेरिटेज साइट की तरह अबु सिम्बल को संजोया नहीं गया होता तो शायद ये अद्भुत मंदिर पास से गुजरने वाली नील नदी से जुड़ी झील में डूब कर खत्म हो चुका होता।
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काटकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया गया मंदिर

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ब्रिटिश जियोग़्राफिक एक्स्पेडीशन कंपनी की डायरेक्टर किम कीटिंग का कहना है कि मिस्र ने अपनी ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए बहुत काम किया है। अबु सिम्बल का ये मंदिर इसकी सबसे बड़ी मिसाल है, जिसे नील नदी पर बनने वाले अस्वान बांध की वजह से एक जगह से हटाकर दूसरी जगह तामीर किया गया, वो भी जस का तस।

उत्तरी अफ्रीका की नुबियन घाटी एक तरफ दक्षिणी मिस्र तो दूसरी तरफ उत्तरी सूडान तक फैली है। दूर-दराज में खजूर के दरख्तों से घिरे नखलिस्तान हैं जहां से मौसमी नदियां निकलती हैं। यहीं से होकर बहती है मिस्र का वरदान कही जाने वाली नील नदी। तमाम छोटी नदियां इसी में आकर मिल जाती हैं। प्राचीन काल में ये इलाका बहुत दौलतमंद था। उस दौर के राजाओं ने यहां पिरामिड, विशाल इमारतें और मंदिर बनवाए। इसके पीछे उनका मकसद अपनी ताकत का नमूना पेश करना था ताकि आने वाली पीढ़ियां उन्हें याद रखें।

इसी दौर में यानी ईसा से करीब 1300 साल पहले अबु सिम्बल मंदिर भी बनवाया गया था। तारीखी सबूतों के मुताबिक इस मंदिर के निर्माण में करीब बीस साल का समय लगा था। इसी मंदिर के साथ एक और छोटा-सा मंदिर है जो फराओ रैमसेस की पत्नी नेफरतारी की शान में बनवाया गया था।

नील नदी इस मंदिर के बहुत नजदीक से होकर गुजरती है। मिस्र के लोगों की पानी की जरूरत पूरी करने और बिजली पैदा करने के लिए साठ के दशक में अस्वान बांध की योजना बनी। अस्वान बांध की वजह से उस इलाके में एक झील बन जाने वाली थी जिसमें ये मंदिर डूब जाता। आज उस झील को कर्नल नासिर झील के नाम से जानते हैं।

बांध से डूब सकता था मंदिर

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उस वक्त संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को ने इस धरोहर को इंसानियत के लिए जरूरी मानते हुए बचाने का फैसला किया। तमाम देशों से जानकार बुलाकर मिस्र में जमा किए गए। इसके बाद तय हुआ कि मंदिर को टुकड़ों में काटकर दूसरी जगह ले जाकर फिर से जमाया जाएगा।

इस टीम ने करीब पांच साल तक मशक्कत की। मंदिर के टुकड़े-टुकड़े करके उन्होंने उसे उठाया और उसी पहाड़ी पर करीब 60 मीटर ऊंचाई पर लाकर फिर से जोड़कर उसी तरह का मंदिर तैयार कर दिया। बादशाह रैमसेस के मंदिर को 860 टुकड़ों में काटा गया। वहीं रानी के मंदिर को दो सौ से ज्यादा टुकड़ों में काटकर दूसरी जगह ले जाया गया।

मजे की बात रही कि दूसरी जगह ले जाकर भी मंदिर को इस तरह से बनाया गया कि पुराने मंदिर के बराबर रोशनी ही उस पर पड़े। यहां तक कि साल में दो बार, यानी 22 फरवरी और 22 अक्टूबर को सूरज की किरणें मंदिर के भीतर तक पहुंचती हैं और रैमसेस के बुत को रोशन करती हैं। माना जाता है कि 22 फरवरी को ही बादशाह रैमसेस ने गद्दी संभाली थी। वहीं 22 अक्टूबर को रैमसेस द्वितीय का जन्म हुआ था।
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उसी नाप के खांचे दूसरे पहाड़ पर उकेरे गए

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यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर के डायरेक्टर डॉ। मेक्टिल्ड रोस्लर का कहना है कि मंदिर को एक जगह से हटाकर दूसरी जगह ले जाने और स्थापित करने का काम आसान नहीं था। आज इस तरह के काम की कल्पना भी नहीं की जा सकती। मंदिर के जिन टुकड़ों को हटाया गया था बिल्कुल उसी नाप के खांचे दूसरे पहाड़ पर उकेरे गए थे। ये बहुत मुश्किल काम था।

डॉ। रोस्लर कहते हैं कि अबू सिम्बल ही ऐसी इमारत थी जिसके निर्माण में यूनेस्को की सांस्कृतिक टीम, विज्ञानिकों और शिक्षा विभाग ने एक साथ मिलकर काम किया था। यूनेस्को के लिए ये एक जोखिम भरा प्रोजेक्ट था। लेकिन इस प्रोजेक्ट के बाद साबित हो गया कि यूनेस्को दुनिया भर में फैले अपने-अपने क्षेत्र के माहिरों को साथ लाकर काम करने का काबिल है। साथ ही सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए वो दुनिया को साथ लेकर चल सकते हैं।

इसकी स्थापना 1945 में हुई थी। 60 के दशक में इसके केवल 100 सदस्य देश हुआ करते थे। आज ये संख्या 195 है। जबकि इसके दस सहायक मेम्बर हैं। साथ ही इस प्रोजेक्ट ने एहसास दिलाया कि ऐतिहासिक धरोहरें बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग एक साथ आ सकते हैं और फंड इकट्ठा कर सकते हैं।
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कई प्रोजेक्ट पर काम कर रहा यूनेस्को

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यूनेस्को ने अब ऐसे ही और कई प्रोजेक्ट पूरा करने का बीड़ा उठा लिया है। मिसाल के लिए अभी इटली के वेनिस शहर बचाने के प्रोजेक्ट पर काम जारी है जो कि 1960 में आई बाढ़ में कमोबेश तबाह हो गया था।

साल 1965 में वॉशिंगटन डीसी में व्हाइट हाउस कांफ्रेस में वर्ल्ड हेरिटेज ट्रस्ट बनाने का प्रस्ताव रखा जिसके तहत दुनिया भर के ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व वाली जगहों को संजोना था। इसके कुछ साल बाद ही इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर ने ठीक इसी तरह का प्रस्ताव रखा। 1972 में दोनों प्रस्तावों को साथ मिलाकर काम किया जाने लगा।

नूबिया कैंपेन प्रोजेक्ट की कामयाबी के बाद ही बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरों जैसे मैक्सिको की मोनार्क बटरफ्लाई बायोस्फेयर रिजर्व, जर्मनी के केव एंड आइस एज आर्ट इन द स्वाबियन जूरा को बाचाया जा सका। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका का रॉबेन द्वीप भी यूनेस्को की कोशिशों की बदौलत ही दुनिया के सामने अपने असली रूप में आज भी मौजूद है। ये वही द्वीप है जहां की जेल में नेल्सन मंडेला को रखा गया था।

इसी तरह इराक, यमन और इथियोपिया जैसे देशों में भी बहुत सी ऐतिहासिक धरोहरें बचाने का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। ये वो देश हैं जो फिलहाल जंग की आग में जल रहे हैं। अगर यहां तारीखी निशान नहीं बचाए गया तो हो सकता है कि इंसानियत का बहुत बड़ा खजाना दुनिया से खत्म हो जाए।
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1700 साल पुराना एक्सम ओबेलिस्क

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अब से दस साल पहले यूनेस्को ने इथियोपिया के ओबेलिस्क ऑफ एक्सम को इटली से लाकर दोबारा स्थापित किया। ये अशोक की लाट जैसे ही ऊंचे खंबे हैं जो सैकड़ों साल पहले इथियोपिया के शासकों ने लगवाए थे। जब इटली ने 1937 में इथियोपिया पर कब्जा किया तो उसमें से ये स्तंभ अपने देश उठा ले गए थे।

ये विशाल स्तंभ 160 टन ग्रेनाइट से बना है और 24 मीटर लंबा है। इसे इटली से वापस इथियोपिया लाने में यूनेस्को ने बहुत अहम रोल निभाया है।

अबु सिम्बल मंदिर 1968 में पूरी तरह से नई जगह पर तैयार हो गया था। आज उस वाकये को आधी सदी से ज्यादा वक्त बीत चुका है। ये मंदिर दुनिया भर में मशहूर है। दुनिया भर से लोग इसे देखने मिस्र आते हैं।

जरा सोचिए अगर तारीख के इस बेशकीमती खजाने को इंसानियत ने एकजुट होकर ना संजोया होता तो दुनिया तीन हजार साल पुराने एक दौर के गवाह को दरिया-ए-नील के पानी में डुबो चुकी होती।

विश्व धरोहर को संजोने की जिम्मेदारी किसी एक देश की नहीं। न ही एक देश अकेले ये काम कर सकता है। इसके लिए मानवता को एकजुट होना होगा।

ऐसा होने पर तीन हजार साल से भी ज्यादा पुराने अबु सिम्बल मंदिर को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने का चमत्कार हो जाता है।
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