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'उमर खालिद-खालिस्तान के पोस्टर मतविभिन्नता के प्रतीक हो सकते हैं, किसान आंदोलन में फूट के संकेत नहीं'

Sun, 13 Dec 2020 03:40 PM IST
मुकेश कुमार झा अमित शर्मा, नई दिल्ली

सार

  • केंद्र सरकार की किसानों से बातचीत का अभी तक नहीं निकल सका है कोई समाधान, 26 नवंबर से शुरू हुआ है आंदोलन
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उमर खालिद - फोटो : Facebook
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विस्तार
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क्या किसान आंदोलन में फूट पड़ गई है? क्या कुछ किसान नेता आंदोलन में शरजील इमाम और उमर खालिद के पोस्टर लहराए जाने से नाराज हैं और इस कारण आंदोलन से पीछे हटने की तैयारी कर रहे हैं। किसान नेताओं ने इस तरह की किसी भी आशंका को खारिज कर दिया है। किसान नेताओं का कहना है कि संयुक्त किसान मोर्चा के सभी 30 किसान संगठन पूरी तरह एकजुट हैं और अपनी मांग पूरी कराए बिना पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। सरकार इस तरह की खबर फैलाकर आंदोलन को कमजोर करने की साजिश रच रही है।

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ऑल इंडिया किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के नेता अविक साहा ने अमर उजाला से कहा कि आंदोलन की शुरूआत से ही किसानों को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्हें कभी खालिस्तानी तो कभी नक्सली कहकर अपमानित किया जा रहा है। अब शरजील इमाम, वरवरा राव या उमर खालिद के पोस्टर को बहाना बनाया जा रहा है। लेकिन अब तक सरकार की कोशिशें सफल नहीं हुई हैं और आगे भी नहीं होंगी। सरकार को देर-सबेर विवादित कानूनों को वापस लेने पर विचार करना पड़ेगा।


किसान नेता ने कहा कि पूरे देश में 5000 से ज्यादा किसान संगठन हैं। इतने किसान संगठनों का पूरी तरह विचारों में एक होना संभव नहीं है। किसी किसान संगठन की वैचारिक सोच किसी एक विचारधारा से मिल सकती है तो किसी दूसरे संगठन की सोच किसी अन्य विचार से मिल सकती है। लेकिन इसकी वजह से उनके बीच फूट नहीं हो जाती क्योंकि उनके लड़ाई के मूल बिंदु पूरी तरह एक हैं। विवादित लोगों के पोस्टर को वैचारिक मतभिन्नता के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे किसान संगठनों के बीच फूट के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा मतविभिन्नता में एकता में निहित रही है और इसे इसी रूप में देखा जाना चाहिए।
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शरजील इमाम-उमर खालिद के पोस्टर मतविभिन्नता के प्रतीक
अविक साहा ने कहा कि भारतीय किसान यूनियन (उगराहां) का यह मानना है कि सरकार हर जगह लोगों का दमन कर रही है। वह लोगों की वैचारिक स्वतंत्रता का दमन कर रही है। इसलिए 10 दिसंबर के एक कार्यक्रम में शरजील इमाम और उमर खालिद के पोस्टर उनकी जनसभाओं में लहराए गए थे। लेकिन यह केवल इस संगठन की सोच थी। किसान आंदोलन के बाकी के संगठन उसकी इस सोच के समर्थन में नहीं हैं।

शरजील इमाम या उमर खालिद का मामला पूरी तरह एक पुलिस व्यवस्था और अदालत के बीच का मामला है। वह अपने सबूतों के आधार पर इस मामले में जो भी करना चाहें, वे कर सकते हैं, वे कर भी रहे हैं। लेकिन इसका किसान आंदोलन से कोई मतलब नहीं है।

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