भाजपा सांसद समीर ओरांव ने कहा है कि समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) से देश के दुश्मनों को डरने की जरूरत है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं, उनके असली इरादों को पहचानने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यूसीसी से देश के किसी आदिवासी समुदाय के हितों को कोई चोट नहीं आएगी। समान नागरिक संहिता के मसौदे में आदिवासी समुदाय के लोगों की कस्टमरी प्रैक्टिसेज (पारंपरिक रीतिरिवाज) को सुरक्षित रखने की पूरी गारंटी दी जाएगी।
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भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष समीर ओरांव ने अमर उजाला से कहा कि वामपंथी लोगों के साथ-साथ एक विशेष वर्ग के लोग यह भ्रम फैलाना चाहते हैं कि यूसीसी से आदिवासी समुदाय के लोगों के हितों को चोट पहुंचेगी। चुनावी मौसम देखते हुए कुछ राजनीतिक दल भी इसको हवा देने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि इसके मसौदे में देश के सभी जनजातीय वर्गों की मान्यताओं को सुरक्षित रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि देश की स्वतंत्रता से लेकर अब तक के 60 सालों में आदिवासियों को बरगलाया गया, लेकिन उनकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। लेकिन अब आदिवासी समुदाय देख रहा है कि किस तरह केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद उनके विकास के लिए ठोस जमीनी काम हुए हैं। आदिवासी बहुल क्षेत्रों में विकास की नई संभावनाएं तलाश कर उनकी जिंदगी बदलने का काम किया जा रहा है।
इससे न केवल उनको रोजगार की नई संभावनाएं मिल रही हैं, बल्कि उनके अंदर शिक्षा का प्रसार भी हो रहा है। यही कारण है कि अब आदिवासी समुदाय एकजुट होकर भाजपा को समर्थन कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि आगामी चार राज्यों के विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव 2024 में आदिवासी समुदाय का भाजपा को और भी ज्यादा समर्थन हासिल होगा।
आदिवासी समुदाय कितना महत्त्वपूर्ण
2011 की जनगणना के अनुसार, देश में आदिवासियों की आबादी लगभग 8.6 फीसदी है। वर्तमान में यह 10.50 करोड़ के करीब हो सकती है। देश में लगभग 705 जनजातीय समुदाय हैं जिनमें 75 को विशेष तौर पर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर कमजोर और पिछड़ा हुआ माना जाता है। अपने इस संख्या बल के कारण ये समुदाय किसी भी चुनाव में किसी पार्टी की जीत या हार तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
देश की संसद में इस वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने के लिए इनके लिए अधिकतम 47 लोकसभा सीटें आरक्षित रखी गई हैं। अनुसूचित जाति के लिए अधिकतम 84 लोकसभा सीटें आरक्षित होती हैं, इस प्रकार कुल आरक्षित सीटों की संख्या अधिकतम 131 हो सकती है।
आदिवासी समुदाय को लंबे समय तक कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था, लेकिन बीते तीन दशकों में भाजपा ने इनके बीच अपनी अच्छी पैठ बनाने में सफलता पाई है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 27 आदिवासी सीटों पर सफलता मिली थी जो कि 2019 में 31 सीटों तक पहुंच गया था। भाजपा का दावा है कि वह अपने इन मतदाताओं पर पकड़ बरकरार रखेगी और पहले से भी ज्यादा सीटों पर सफलता हासिल करेगी।