एक पिता की ओर से बच्चे को दिए जाने वाले गुजारा भत्ते का मतलब केवल दो वक्त का भोजन नहीं है, बल्कि उसे वह सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए, जो माता-पिता के साथ रहते हुए मिलतीं। सत्र अदालत ने यह टिप्पणी बच्चे की देखभाल के लिए 12 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ता देने का निर्देश देते हुए की।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजीव जैन ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले के खिलाफ बच्चे के पिता की अपील खारिज कर दी। उसे 12 हजार रुपये महीना बच्चे व छह हजार रुपये महीना पत्नी को बतौर गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया है। अदालत ने फैसले में कहा कि गुजारा भत्ता उस लाभ, दर्जा व पैसे के आधार पर तय किया जाना चाहिए, जो उसे माता-पिता के साथ रहते हुए मिलते। सुनवाई के दौरान अदालत ने पीड़िता की उस दलील को भी माना कि उसके पति ने शादी के छह साल बाद घर की नौकरानी से संबंध बना लिए, जिससे दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। इसके पति उससे मारपीट व प्रताड़ित करने लगा। उसने मारपीट के बाद एमएलसी नहीं बनवाई तो इसका मतलब यह नहीं है कि उससे मारपीट नहीं हुई।
मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए बच्चे के पिता ने कहा था कि वह हर माह केवल 15-20 हजार रुपये कमाता है। उस पर बीमार पिता की भी जिम्मेदारी है। इस दलील को खारिज करते हुए सत्र अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने महिला के पति की आय 50 हजार रुपये मासिक मानी है, जो पूरी तरह सही है। महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि वह पति से कई बार अलग हुई और पुलिस के पास भी गई, लेकिन पति हर बार शांति से रहने की बात कहकर माफी मांग लेता और उनमें समझौता हो जाता। महिला ने कहा कि वह पति से 2011 में अलग हो गई, क्योंकि 2010 में बेटे के जन्म के बाद उसे खर्चा देना बंद कर दिया गया। पति उसे लगातार प्रताड़ित करता रहा।