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गायों पर राजनीति करने वालों के लिए सबक हैं अमरोहा के दो मुस्लिम परिवार

Tue, 21 Jun 2016 06:18 AM IST
विकल सिंह/अमर उजाला, अमरोहा
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गाय और गोकशी को मुद्दा बनाकर राजनीति करने वालों के लिए अमरोहा के शमशाद खां और इकरार खां का परिवार एक सबक है। दोनों के पास 60-70 गायें हैं। गायों को बच्चों की तरह प्यार से पाला जाता है। परिवार के लोगों से गायें इस कदर घुली मिली हैं कि छोटे-छोटे बच्चे इनके बीच खेलते रहते हैं। गायों को बांधने की जरूरत नहीं पड़ती। बाड़े में खुली ही रहती हैं। किसी की क्या मजाल जो गायों की ओर उंगली उठाकर भी देख ले। इनके लिए गाय औलाद से कम प्यारी नहीं हैं।
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हसनपुर तहसील के जयतौली गांव की आबादी करीब छह हजार है। हिंदू और मुसलिम आबादी तकरीबन बराबर-बराबर है। इसी गांव में शमशाद खां पठान का परिवार रहता है। इकरार पठान अपनी मां नफीसा के साथ रहते हैं। दोनों के पास 60-70 गायें हैं। सभी गायें देशी नस्ल की हैं।

इकरार व शमशाद खां दिन निकलते ही गायों को चराने के लिए निकल जाते हैं। शमशाद वृद्ध हो गए हैं तथा ज्यादा दूर तक चलना फिरना उनके बस का नहीं रहा । अब बेटा शहजाद गायों को चराता है। गांव के जंगल के साथ ही महरपुर गुर्जर, शहवाजपुर गुर्जर, महमूदाबाद, गंगानगर, सिरसा गुर्जर तक गायों को चराते हैं। बस उन्हें कष्ट इस बात का है कि गायों के चराने के लिए कुदरती जंगल अब खत्म होते जा रहे हैं।
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जब तक बछड़ा नहीं लाओगे खाना नहीं मिलेगा 
शमशाद पठान के परिवार को गायें औलाद से भी ज्यादा प्यारी हैं। इनकी पत्नी 15 साल पुराना वाकया सुनाती हैं। कहती हैं कि गांव के ही एक शख्स ने चार हजार रुपये में उनका बछड़ा खरीद लिया। गांव का ही कुरैशी युवक दो हजार रुपये महंगे दाम पर उससे बछड़े को  खरीद लाया। दूसरे दिन बछड़े को काटा जाना था।

शाम को गाय चराने के बाद जैसे ही शमशाद घर आए, पत्नी अट्टो से खाना मांगा। बछड़ा बेचे जाने से बेहद नाराज अट्टो ने साफ कह दिया जब तक बछड़ा वापस नहीं लाओगे घर पर किसी के लिए भी खाना नहीं बनेगा। चार हजार में बेचा गया बछ़डा आठ हजार में वापस मिला। इसके बाद घर पर खाना पका था। 
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कहीं पत्नी गायों को न बिकवा दे, इसलिए नहीं कराई शादी

- फोटो : Getty
जयतौली गांव निवासी इकरार पठान गायों के रक्षक हैं। गोसेवा के लिए शादी नहीं की। जब भी मां नफीसा बेटे पर शादी का दवाब बनातीं, यह कह कर इंकार कर देते कि बीवी आते ही उनकी गायों को बिकवा देगी। वृद्ध मां कहती हैं कि निकाह के लिए तमाम रिश्तेदारों ने समझाया और दबाव बनाया, मगर किसी की बात नहीं मानी। वृद्ध मां ही खाना बनाती है। सुबह दिन निकलते ही कहीं से घास, पुआल आदि का इंतजाम करने के बाद गायों को चराने ले जाते हैं।

गाय लक्ष्मी समान, इसी से सब कुछ मिला
वृद्ध शमशाद पठान और इनके बेटे इरशाद व शहजाद कहते हैं कि किसी के लिए गाय राजनीति, मजहब आदि का मुद्दा हो सकती है, मगर हमारे लिए तो यह घर लक्ष्मी के समान हैं। गायों से ही उनको सब कुछ मिला है। परिवार का कहना है कि गायों से देशी खाद मिलता है, जिससे फसलें लहलहाती हैं साथ ही जुताई के लिए बैल। गायों की कमाई से ही हर साल जमीन खरीद लेते हैं।
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