राष्ट्रपति पद पर राम नाथ कोविंद के चुनाव जीतने और उसी दिन राज्यसभा से बसपा प्रमुख मायावती का इस्तीफा मंजूर होने की घटना के सियासी मायने देखे जा रहे हैं। बेशक मायावती का इस्तीफा मंजूरी और कोविंद के चुनाव जीतने की घटना संयोग हो, मगर इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता है।
एक ही दिन एक दलित नेता ने राष्ट्रपति का चुनाव जीतकर देश का प्रथम नागरिक बनने की बाधाएं पार की हैं। तो दूसरी नेता का संसद से संयास हुआ है। 20 जुलाई को घटी इस राजनीतिक घटना को यूपी के भावी सियासी संग्राम की कवायद माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर बसपा और भाजपा के बीच दलित सियासत को लेकर जारी जंग के और तेज होने के आसार हैं।
गुरूवार 20 जुलाई का दिन यूपी की भावी दलित राजनीति के लिए बेहद अहम माना जाएगा। राष्ट्रपति के चुनाव और मायावती के इस्तीफे से दलित वोट को लेकर बसपा—भाजपा के बीच शुरू हुई सियासत की जंग लोकसभा चुनाव 2019 तक जारी रहेगी।
कानपुर के कोविंद ने जीता राष्ट्रपति का चुनाव
ramnath kovind
गुरूवार को जहां एकओर दलित बिरादरी से ताल्लूक रखने वाले कानपुर के राम नाथ कोविंद ने राष्ट्रपति का चुनाव जीत लिया है। तो दूसरी ओर बसपा प्रमुख मायावती का राज्यसभा से इस्तीफा मंजूर हुआ है। दलित मामलों पर न बोलने देने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा देने वाली मायावती ने पहले ही एलान कर दिया है कि वे इस मामले को यूपी की जनता के बीच लेकर जाएंगी।
उनकी पार्टी ने मायावती के इस्तीफा प्रकरण को लेकर जिलावार कार्यक्रम करने का एलान किया हुआ है। तो कोविंद को कानुपर की गलियों से निकालकर रायसीना हिल का ताज सौंपने वाली भाजपा उनके दलित वर्ग से होने को भूनाने में पीछे नहीं रहेगी।
कोविंद की उम्मीदवारी का ऐलान करते वक्त भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस बात के स्पष्ट संकेत दे दिए थे। अब पार्टी कोविंद के शपथग्रहण को भी यादगार बनाने की तैयारी में है। कोविंद के जरिए भाजपा की नजर यूपी दलित वोटों पर है।
माया का इस्तीफा संयोग या राजनीतिक चाल
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एक ही दिन राष्ट्रपति पद पर दलित नेता कोविंद के चुनाव जीतने और मायावती की राज्यसभा से इस्तीफा मंजूर होने की घटना को वैसे तो संयोग माना जा रहा है। मगर सियासी गलियारे में इसे राजनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है। वैसे भी मायावती ने अपना इस्तीफा मंगलवार को दिया।
वह भी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर उन्होंने अपना इस्तीफा सौेंपा। ऐसे में उनके इस्तीफे के मंजूर होने में इतना वक्त लगने का कोई औचित्य नहीं। मगर राज्यसभा से मायावती के इस्तीफे को औपचारिक तौर पर गुरूवार को स्वीकार किया। जबकि यह तय था कि इसी दिन राष्ट्रपति चुनाव का परिणाम आना है।
जिसमें कोविंद की भारी जीत पहले से ही तय थी। यही वजह है कि मायावती के इस्तीफे को संयोग के बजाय राजनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है।
1माह पहले से तय थी मायावती के इस्तीफे की पटकथा
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सरकार के सूत्रों की मानें तो मायावती के राज्यसभा से इस्तीफे की पटकथा 1 माह पहले लिखी जा चूकी थी। जिसके सूत्रधार राजद अध्यक्ष लालू यादव हैं। माया से मिलकर लालू ने ही बसपा प्रमुख के इस्तीफे की पटकथा लिखी थी। उनकी मंशा माया के जरिए बिहार के दलित वोटों को साधने की है।
इस्तीफे के बाद लालू यादव ने सार्वजनिक रूप से मायावती को बिहार से राज्यसभा में भेजने का आॅफर भी दिया है। अब सवाल यह है कि जब मायावती को बिहार से राज्यसभा में जाना ही है तो उन्होंने इस्तीफा क्यों दिया। मगर माया के करीबियों की मानें तो माया अभी राज्यसभा में जाने और न जाने की राजनीति के बजाय अपने आप को यूपी में केंद्रीत करेंगी। वैसे लालू हमेसा से बिहार की तर्ज पर यूपी में भी भाजपा के खिलाफ महागठबंधन के पैरोकार रहे हैं। आने वाले दिनों में वे बसपा प्रमुख की सपा से गठजोड कराने की पूरजोर कोशिश भी करेंगे।
इस बीच भाजपा भी मान रही है कि आने वाले दिनों में दलित वोट को लेकर उसका संघर्ष बसपा के साथ बढेगा। बसपा के आरोपों की ढाल के रूप में नेता अपरोक्ष रूप से कोविंद को राष्ट्रपति पद तक पहुंचाने की बात कर दलित बिरादरी के बीच हमदर्दी बढाएंगे। भाजपा के एक वरिष्ठ महासचिव का कहना है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार चयन में पार्टी ने राजनीतिक हित बेहत्तर ढंग से साधे हैं।
कोविंद के शपथग्रहण में शामिल होंगे भाजपा के सभी मुख्यमंत्री
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कोविंद के शपथग्रहण को असरदार बनाने के लिए सरकार और संगठन दोनों ही स्तर पर तैयारी जोरों पर है। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाले कोविंद 25 जूलाई को पद की शपथ लेंगे। शपथग्रहण समारोह वैसे तो राष्ट्रपति भवन के केंद्रीय कक्ष में होना है। मगर भाजपा इस क्षण को भी शक्ति प्रदर्शन के रूप में दिखाने का तैयारी कर रही है।
पार्टी एवं राजग शासित राज्यों के सभी मुख्यमंत्रियों को शपथग्रहण समारोह में उपस्थित रहने को कहा गया है। तो केंद्र सरकार के आलामंत्री भी समारोह में उपस्थित रहेंगे। बताया जा रहा है कि कोविंद के शपथग्रहण समारोह को असरदार बनाने के लिए केंद्रीय गृहसचिव राजीव महर्षि बीते दस दिनों से सक्रिय हैं। विभिन्न विभाग और मंत्रालयों के अधिकारियों संग उन्होंने इस मामले में कई दौर की बैठके की हैं।