दरअसल, यह पूरा विवाद गोशाला के 20 हजार वर्ग मीटर के एक भूमि विवाद से जुड़ा हुआ है। बिजनौर के नगीना में श्रीकृष्ण गोशाला है जहां आज भी लगभग 150 गायों की सेवा की जाती है। इस गोशाला की नींव एक एनआरआई महिला अलका लाहौटी के पिता ने 1953 में रखी थी। उन्होंने एक रजिस्टर्ड सोसाइटी बनाकर पूरी भूमि उसके नाम कर दी थी।
यह पूरी भूमि कागजों में अभी भी इसी सोसाइटी के नाम पर ही है। अलका लाहौटी इसकी चुनी हुई अध्यक्ष हैं। वे आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के गो संरक्षण विभाग में मेरठ संभाग की सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। अपने पिता की मृत्यु के बाद साल 2014 में अलका लाहौटी ने इंडोनेशिया से वापस भारत आकर इस सोसायटी का कामकाज संभाल लिया था।
इस पूरे विवाद की शुरुआत लगभग 20 वर्ष पहले हुई थी। कथित तौर पर लाहौटी के पिता की वृद्धावस्था में कम सक्रियता का लाभ उठाकर संतोष कुमार अग्रवाल और उनके एक अन्य करीबी ने इस भूमि पर कब्जा करना शुरू कर दिया। कथित तौर पर अग्रवाल परिवार स्वयं को चंपत राय का चचेरा भाई बताते थे।
उन्होंने इस भूमि पर न केवल कब्जा कर लिया, बल्कि इस पर कृष्ण गोपाल महाविद्यालय नाम से एक कॉलेज भी खोल दिया जो आज भी मौजूद है। आरोप है कि महाविद्यालय को मान्यता देने के लिए चंपत राय ने एक सिफारिशी पत्र रूहेलखंड विश्वविद्यालय को लिखा था। इस सिफारिश पर महाविद्यालय को मान्यता दे दी गई।
हालांकि, चंपत राय या उनके परिवार की ओर से इस संदर्भ में अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। गोशाला की भूमि पर कब्जा करने का यह विवाद आगे बढ़ा और अदालती कार्रवाई तक जा पहुंचा। लेकिन यहां अलका लाहौटी का पक्ष मजबूत बना रहा और अदालत ने भूमि से कब्जा हटाने का आदेश सुनाया था।
उल्लेखनीय है कि अदालत के आदेश पर उत्तर प्रदेश में साल 2017 में भाजपा सरकार आने के पहले गोशाला की करीब 75 फीसदी भूमि गोशाला को वापस मिल गई थी। लेकिन बाकी बची लगभग 25 फीसदी भूमि वापस पाने के लिए अलका लाहौटी अभी भी कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। वर्तमान विवाद इसी से ही जुड़ा हुआ है।
अलका लाहौटी ट्वीट के जरिए इस विषय को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और अन्य शीर्ष अधिकारियों के संज्ञान में ला चुकी हैं। लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने पत्रकार विनीत नारायण को इसकी जानकारी दी और मदद की अपील की। इसके बाद उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए इस मामले को उठाया और यह एक बड़ा मुद्दा बन गया।
विनीत नारायण के अनुसार, इस फेसबुक पोस्ट के कारण 19 जून को उन पर नगीना थाने में एक एफआईआर दर्ज कराई गई। एफआईआर दर्ज करते समय पुलिस को प्राथमिक स्तर की जांच करनी चाहिए थी। लेकिन इस मामले में पुलिस ने ऐसा कुछ नहीं किया। विनीत नारायण का कहना है कि अगर पुलिस भूमि पर कब्जे की स्थिति की जांच करती तो भी सारी कहानी समझ आ जाती।
ऐसे ही तहसील के अधिकारी के नोट और गोशाला की भूमि पर चल रहे अवैध कॉलेज पर रूहेलखंड विश्वविद्यालय के अधिकारियों की रिपोर्ट भी सारी कहानी कह देते। लेकिन पुलिस ने इसकी जांच भी नहीं की। उलटे, बिजनौर के एसपी धर्मवीर सिंह ने 24 घंटे के अंदर यह बयान दे दिया कि प्राथमिक दृष्टि में चंपत राय या उनके परिवार का भूमि विवाद से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा था कि इसके बाद भी वे मामले की जांच कर रहे हैं।
विनीत नारायण के मुताबिक, भूमि पर विवाद के कारण यह मामला रूहेलखंड विश्वविद्यालय के सामने भी पहुंचा था। अदालत की ओर से आदेश जारी होने के बाद रूहेलखंड विश्वविद्यालय ने अपनी एक टीम भेजकर मौके का मुआयना भी कराया था। टीम ने विश्वविद्यालय को लिखा है कि जमीन का मालिकाना हक महाविद्यालय के पास नहीं है, इसलिए उसकी मान्यता को रद्द किया जा सकता है।
लेकिन, छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उसे समय दिया गया कि अगर वह तीन महीने के अंदर जरूरी और सही कागजात दे देता है तो उसकी मान्यता को बरकरार रखा जा सकता है। इस आदेश को 15 महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक न तो महाविद्यालय अपने जरूरी कागजात विश्वविद्यालय को जमा करा सका है, और न ही महाविद्यालय की मान्यता रद्द हुई है।
विनीत नारायण ने कहा है कि मेरे खिलाफ किया गया मुकदमा, केवल डराने की कोशिश है। इस लड़ाई को कानूनी तरीके से लड़ने के लिए तैयार हूं। लेकिन अगर चंपत राय को लगता है कि इस भूमि विवाद से उनका कोई संबंध नहीं है, तो उन्हें अयोध्या विवाद की तरह इस मामले में भी सामने आकर यह स्पष्ट करना चाहिए। अगर वे ऐसा कह देते हैं, और दस्तावेजों के जरिए इसे साबित भी कर देते हैं तो वे उनसे क्षमा मांगने के लिए भी तैयार हैं।