विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप भारत को जिस हद तक झुकाना चाहते हैं, वह रणनीतिक, कूटनीतिक व घरेलू परिस्थितियों के कारण संभव नहीं है। ट्रंप जो चाहते हैं, उसे देने के लिए भारत के पास बेहद सीमित विकल्प हैं। सबसे पहले तो भारत रूस से इतनी दूरी नहीं बना सकता कि वह पूरी तरह चीन के पाले में चला जाए। ऐसा हुआ तो चीन-पाकिस्तान की दोस्ती के कारण बड़ी कूटनीतिक-सामरिक चुनौती झेल रहे भारत का सामना चीन-पाकिस्तान-रूस की तिकड़ी से होगा।
ट्रंप की इच्छाओं के अनुरूप भारत अपने कृषि क्षेत्र और उद्योग को अमेरिका के रहमोकरम पर नहीं छोड़ सकता। वैसे भी ऑपरेशन सिंदूर मामले में जनमानस का रुख अमेरिका के बेहद प्रतिकूल है। कोई भी सरकार अपने जनमानस के विपरीत अमेरिका के सामने हथियार डालने का खतरा मोल नहीं ले सकती।
पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं कि वार्ता जारी रहने के बीच ट्रंप की 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा भारत पर मनमाफिक समझौता थोपने के लिए दबाव बनाने की रणनीति है। भारत अमेरिकी इच्छाओं के अनुरूप उससे कोई रक्षा सौदा तो कर सकता है, रूस से तेल-ऊर्जा आयात में कटौती तो कर सकता है, मगर रक्षा उपकरणों की खरीद के मामले में अमेरिका को रूस की जगह नहीं दे सकता।
कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ट्रंप की घोषणा को व्यापारिक उपायों का आर्थिक युद्ध के उपयोग के रूप में देखते हैं। उन्होंने कहा कि भारत ने अपने ऑटो पार्ट्स, स्टील और एल्युमीनियम निर्यात पर ट्रंप की ओर से पहले लगाए गए टैरिफ का जवाब देने से परहेज किया और इसके बजाय बातचीत का विकल्प चुना, मगर अमेरिका भारत के विशाल बाजार तक निर्बाध पहुंच के लिए अतिवादी मांगों पर जोर दे रहा है।
अमेरिका को क्या दे सकता है भारत
अमेरिका भारतीय बाजार में निर्बाध प्रवेश चाहता है। उसकी निगाहें भारत के कृषि क्षेत्र पर भी है। उसकी इच्छा है कि भारत रूस की जगह उससे रक्षा उपकरण खरीदे और ऊर्जा जरूरतों के लिए उसे तरजीह दे। वहीं, भारत किसी भी सूरत में न तो कृषि क्षेत्र में अमेरिकी पैठ बढ़ाने के लिए तैयार है और न ही रक्षा उपकरणों के मामले में अमेरिका पर निर्भर होना चाहता है। ऐेसे में भारत अमेरिका को ऊर्जा क्षेत्र में आयात बढ़ाने, तेल आयात और जीवाश्म ईंधन आयात बढ़ाने का प्रस्ताव दे रहा है।
रूस को अहमियत क्यों?
रक्षा सहयोग में भारत और पहले यूएसएसआर और अब रूस के बीच भारत का रिश्ता सात दशक पुराना है। रूस भारत को रक्षा उपकरणों के साथ तकनीक और प्रशिक्षण भी देता है। कूटनीतिक मंच पर हमेशा भारत के साथ खड़ा रहा है। उसके उपकरण अमेरिका से सस्ते हैं। रक्षा उपकरणों को सेना में अपने अनुरूप ढालने में एक से डेढ़ दशक का समय लगता है। दूसरी ओर अमेरिका भारत का कभी विश्वस्त मित्र नहीं रहा है। अगर, अमेरिका पर निर्भरता बढ़ी तो इंडक्शन, ट्रेनिंग, सर्विसिंग और मेंटेनेंस में बहुत समय और रूस के मुकाबले भारी भरकम राशि खर्च होगी।
बंदूक के बल पर कोई समझौता नहीं
सरकारी सूत्र ने कहा, भारत बंदूक की नोक पर समझौता करने के बदले अपने दीर्घकालिक हितों को साधने के लिए अल्पकालिक कष्ट सहने की रणनीति पर चलेगा। भारत को अधिकारी स्तर की वार्ता के नतीजे का इंतजार है। मध्य अगस्त तक हम किसी नतीजे पर पहुंचेंगे। हो सकता है कि इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की ओर से पहल हो और समझौते तक पहुंचते-पहुंचते अक्तूबर तक का समय लगे। भारत किसी समझौते तक पहुंचने के लिए ऑस्ट्रेलिया या ब्रिटेन की तरह जल्दबाजी कर नुकसान नहीं झेलना चाहता। इसकी जगह चीन की तरह वार्ता जारी रखने और तब तक अल्पकालिक टैरिफ कष्ट को झेलने की रणनीति पर चलेगा।