मामले की सुनवाई करने वाली उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने याचिकाकर्ता पर अपना समय बर्बाद करने के लिए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। सुनवाई का पहली बार सीधा प्रसारण किया गया। नौकरी गंवाने वाले शिक्षकों में से एक ने याचिका दायर कर दावा किया था कि ज्ञापन देकर बर्खास्तगी गैरकानूनी है क्योंकि उसे अभी तक कोई व्यक्तिगत नोटिस नहीं दिया गया है।
महाधिवक्ता एसएस डे ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने 10,323 शिक्षकों को बर्खास्त नहीं किया और उच्चतम न्यायालय के एक आदेश से उनकी नौकरी चली गई है। उन्होंने कहा, 'शीर्ष अदालत के अंतिम फैसले के बाद भी राज्य सरकार उनकी सेवा को एक साल के लिए बढ़ाने में कामयाब रही थी। चूंकि, राज्य सरकार ने शिक्षकों को बर्खास्त नहीं किया, इसलिए उसने मीडिया में प्रकाशित एक ज्ञापन के माध्यम से शिक्षकों को शीर्ष अदालत के फैसले के बारे में सूचित किया।'
दोनों पक्षों को सुनने के बाद पूर्ण बेंच ने याचिका खारिज करते हुए जुर्माना लगाया। डे ने बाद में संवाददाताओं से कहा कि अदालत ने याचिकाकर्ता के इस दावे को स्वीकार नहीं किया कि वह मूल मामले का हिस्सा नहीं थे, जिसके कारण शिक्षकों को सामूहिक रूप से बर्खास्त कर दिया गया।
उन्होंने कहा, '2014 में उच्च न्यायालय ने पूर्ववर्ती वाम मोर्चा सरकार द्वारा अपनाई गई भर्ती नीति में खामियां निकाली थीं और इसके तहत नौकरी पाने वाले शिक्षकों को सामूहिक रूप से बर्खास्त करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता जिसे उस भर्ती नीति के तहत नौकरी मिली है, वह स्पष्ट रूप से इसका हिस्सा है।'