सबसे बढ़कर जो उन्होंने लिखा-समझा और कहा, उसे जिया भी। आज उनका अंतिम संस्कार बिना किसी आडंबर के निगम बोध घाट पर सीएनजी क्रीमेटोरियम में कर दिया गया।
उनके बेटे और हमारे पूर्व युवा सहकर्मी विवेक की अचानक मौत के बाद मैं और राजेश जोशी उनके घर पहुंचे तो वे अपने इकलौते जवान बेटे का अंतिम संस्कार करके लौटे थे, गहरे दुख का माहौल था लेकिन सब शांत थे, कोई रोना धोना तो क्या आंसू के निशान भी नहीं थे। राजकिशोर जी ने अपने बेटे के जर्नलिस्टिक कामों को याद किया, उसकी सजगता और मेहनत की सहज तारीफ की। फिर देश समाज की बातें करने लगे, उनकी ये सहजता हमें असहज कर रही थी।
हम उनके संयम और मौत की अनिवार्यता-अपरिहार्यता को स्वीकार पाने के उनके सामर्थ्य को दुखी लेकिन चकित भाव से देख रहे थे। एक बार फिर लगा कि वे बड़े आदमी हैं, आदर और शोक का भाव था लेकिन फिर सीखा कि अपना दुख अपने लिए होता है, दुख दिखाने से दुख की गरिमा नष्ट होती है। लेकिन दुख प्रकट न करना, रो न पाना, गहरे सदमे को अकेले बहादुरी से झेलने की कोशिश ने उन्हें भीतर से खोद दिया।
कुछ ही हफ्तो के भीतर विवेक और राजकिशोर जी को खो देने का दुख विमला जी और अस्मिता को झेलना है। दो-तीन बार की बात और एकमात्र मुलाकात में लगा कि अस्मिता समझदार और बहादुर है। लेकिन ये दोहरा सदमा किसी समझदारी-बहादुरी से परे है।
जिन्होंने राजकिशोर को नहीं पढ़ा है जरूर पढ़ें जिन्होंने पढ़ा है, दोबारा पढ़ें। राजकिशोर काफी दर्ज कर गए हैं जिससे उन्हें और इस देश को समझा जा सके।
सादर श्रद्धांजलि