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बाघों के इलाके में आदिवासियों को नहीं है रहने का अधिकार

Sun, 16 Apr 2017 06:25 AM IST
amarujala.com- Presented by: हर्षित गौतम
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देश भर में बाघों के पर्यावास के लिए मौजूद अति संवेदनशील इलाकों में आदिवासी और अन्य वन्य जातियों को रहने की इजाजत नहीं होगी। नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) ने देश भर के सभी राज्यों के मुख्य वनजीव संरक्षक को पत्र लिखकर कहा है कि गाइडलाइन के अभाव और वन अधिकार कानून-2006 के मुताबिक आदिवासी व अन्य वन्य आबादी को क्रिटिकल वाइल्ड लाइफ हैबिटैट में रहने का अधिकार नहीं है।
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सभी राज्यों के चीफ वाइल्डलाइफ वार्डेन को यह पत्र एनटीसीए के सहायक इंस्पेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट डॉ. वैभव सी माथुर की ओर से भेजा गया है। 2011 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से बाघों के पर्यावास को लेकर जारी अधिसूचना पर स्पष्टीकरण भी जारी किया गया था। इसके मुताबिक बाघों के पर्यावास को लेकर दो क्षेत्र बांटे गए हैं। इनमें किसी भी राष्ट्रीय पार्क व अभ्यारण्य में कोर एरिया को क्रिटिकल वाइल्डलाइफ हैबिटेट व दूसरा बफर जोन स्थापित किया गया है।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक क्रिटिकल वाइल्ड लाइफ हैबिटेट के संबंध में गाइड लाइन अभी प्रक्रिया में हैं। जबकि इसका प्रारूप 2011 में तैयार किया गया था।
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बाघों के क्षेत्र से हटाई जाएंगी बस्तियां

फिलहाल इस आदेश के बाद ऐसी वन आबादी जो जंगलों में मौजूद है और बाघों के पर्यावास वाले कोर एरिया में रह रही है उन्हें जंगलों से हटना होगा। दूसरी तरफ ऐसी आबादी के पुनर्वास को लेकर मुआवजे और अन्य बुनियादी चीजों को लेकर लंबे समय से मांग उठ रही है। इस अधिसूचना के बाद इस मांग पर भी संकट पैदा हो गया है।

दुनिया में मौजूद बाघों की संख्या में भारत की बड़ी हिस्सेदारी है। करीब 70 फीसदी बाघों की आबादी भारत में मौजूद है। बाघों के शिकार और उनके पर्यावास को सुरक्षित रखने के लिए यह अधिसचना जारी की गई थी। फिलहाल कई राज्यों में मौजूद जंगलों में लंबे समय से आदिवासी समाज के लोग रहते हैं।

ऐसे में इस फैसले का विरोध भी हो रहा है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करने वाली संस्थाएं इस पत्र की आलोचना कर रही हैं। श्रुष्टि पर्यावरण मंडल के मुताबिक वह जल्द ही इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे।
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