मणिपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। दरअसल, यहां एक आदिवासी संगठन ने कोरोना से जान गंवाने वाले शिक्षाविद नेहगिनपाओ किपगेन का शव दफनाने पर विरोध जताया। आदिवासी संगठन का तर्क था कि शिक्षाविद राज्य के मूल निवासी नहीं हैं। ऐसे में उसका अंतिम संस्कार यहां नहीं होना चाहिए।
बता दें कि 46 वर्षीय नेहगिनपाओ हैदराबाद स्थित ओपी जिंदल विश्वविद्यालय के दक्षिण पूर्ण एशिया अध्ययन केंद्र के प्रमुख थे। वह कोरोना की चपेट में आ गए थे और 2 मई को दिल्ली स्थित एम्स में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई थी।
यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने बयान जारी कर नेहगिनपाओ को कांगपोक्पी में दफनाने का कानूनी आधार मांगा। संगठन ने कहा कि कि विदेशी को दफनाने से गलत नजीर पेश होगी। साथ ही, सवाल किया कि उन्हें भारतीय नागरिकता कैसे मिली?
थाडोउ स्टूडेंट्स असोसिएशन ने जवाब में कहा कि नेहगिनपाओ का जन्म भले ही म्यांमार के तेइजांग गांव में हुआ था, लेकिन उनकी परवरिश मणिपुर में हुई। इस पर असोसिएशन ने कहा कि उनकी पत्नी चूड़ाचांदपुर की हैं, जबकि उनके रिश्तेदार कांगपोक्पी के हैं। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मणिपुर में की और भारत के विभिन्न हिस्सों में पढ़ाई की। बता दें कि नेहगिनपाओ कुकी समुदाय के थे।
गौरतलब है कि थाउोउस कुकी चिन समुदाय का हिस्सा है, जो करीब दो शताब्दी से इस इलाके में बसा है। इसके बावजूद उनके रिश्तेदार अब भी म्यांमार में मिलते हैं। बता दें कि कांगपोक्पी जिला प्रशासन ने नेहगिनपाओ के शव को ले जाने वाले वाहन को आधे घंटे तक रोकने की अनुमति दी, जिससे लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। इसके बाद उन्हें जिले के लेइकोट इलाके में दफना दिया गया।