बता दें कि दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में ट्रैफिक पुलिस के अलावा सामान्य जवान भी तैनात रहते हैं। वीवीआईपी रूट, बंदोबस्त या कोई धरना प्रदर्शन, इन सभी के लिए दिल्ली पुलिस, ट्रैफिक पुलिस और केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों को तैनात किया जाता है। मौजूदा समय में दिल्ली की हवा बेहद खराब स्थिति से गुजर रही है। वायु प्रदूषण का असर लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रहा है। ट्रैफिक पुलिस और केंद्रीय बलों के जवानों से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने सबसे पहले यही आग्रह किया कि उनका नाम न छापा जाए। रही बात मास्क और चश्मे की, जब आप दिल्ली की सड़कों पर निकलते हैं तो आपको वह गिनती पता चल जाएगी कि कितने जवानों के पास मास्क या चश्मा है। वे औसतन 8 से 12 घंटे तक सड़क पर ड्यूटी करते हैं। ऐसे में अंदाजा लगा सकते हैं कि उनके शरीर में (पार्टिकुलेट मैटर) यानी पीएम 2.5 और पीएम 10 के कण रोजाना कितनी मात्रा में पहुंचते होंगे। उनके फेफड़ों की स्थिति क्या होगी।
दिल्ली पुलिस के जवान, जिनकी ड्यूटी संसद भवन परिसर के निकट लगी है, वे बताते हैं, देखिये एक स्थिति तो वह है कि कोई व्यक्ति इंडिया गेट या किसी खुले पार्क में घूम रहे हैं। उनके लिए प्रदूषण की मार अलग होगी। दूसरी तरह हम लोग हैं, जो 12 घंटे तक उस ट्रैफिक के बीच रह कर ड्यूटी देते हैं, जहां हर पल धुंआ निकलता रहता है। अगर दो चार जवानों को मास्क या चश्मा मिल गया तो अलग बात है। बाकी जवानों को तो खतरनाक प्रदूषण की मार झेलनी पड़ती है। जब रात के समय ट्रैफिक का का पीकऑवर होता है तो सड़क पर लाखों वाहनों की आवाजाही रहती है। बड़े चौराहों पर तो जाम भी लगता है। कई मार्गों पर वाहनों की रफ्तार धीमी रहती है। इसके चलते वायु प्रदूषण, खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है। उस हालत में भी दिल्ली पुलिस और ट्रैफिक पुलिस के जवानों को बिना मास्क और चश्मे के ही काम करना पड़ता है।
दिल्ली की सड़कों पर दिल्ली पुलिस के अलावा केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान भी तैनात रहते हैं। इनके पास भी मास्क या चश्मा नहीं होता। इन जवानों का कहना था, हमारी ड्यूटी तो दिल्ली पुलिस लगाती है। हम तो अपने बल की एक कंपनी का हिस्सा हैं। हमें जैसा बोला जाता है, ड्यूटी स्थल पर खड़े हो जाते हैं। मास्क लगाना है या चश्मा, इस बाबत हमारे पास तो कुछ है नहीं। प्रदूषण के चलते कई जवानों को सांस की दिक्कत हो जाती है। आंखों में जलन होती है। बाकी तो हमें ज्यादा नहीं मालूम। गले में खरास रहती है। ड्यूटी पर पीने का पानी भी नहीं मिलता। बल की गाड़ी खाना लेकर आती है। कई बार ड्यूटी के घंटे बढ़ जाते हैं। ऐसे में जहरीला धुंआ, उनके स्वास्थ्य को जोखिम में डालता है। डॉक्टरों का कहना है कि पुलिस कर्मियों को एन 95 मास्क मिल जाए तो वे प्रदूषण की मार से बच सकते हैं। साथ ही उन्हें चश्मा भी दिया जाए। इस मामले में उच्च अधिकारियों की दलील है, हम तो मास्क देते हैं।
एक निजी अस्पताल की मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. उपासना अरोड़ा ने अमर उजाला से कहा, इस समय घर से बाहर निकलने वाला व्यक्ति हर क्षण प्रदूषण के रूप में खतरनाक तत्वों को अपने शरीर के अंदर ले रहा है। मौजूदा स्थिति में कोई व्यक्ति जितनी ज्यादा देर तक बाहर रहेगा, उसके अंदर उतने ही अधिक प्रदूषणकारी तत्व जाएंगे। जहां तक ट्रैफिक पुलिसकर्मी या कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो खुले में आठ से दस घंटे की ड्यूटी दे रहा है, उसको सांस से संबंधित बीमारियां होने की संभावना, दूसरे व्यक्तियों की तुलना में बहुत ज्यादा होगी। डॉ. उपासना अरोड़ा के अनुसार, इस समय दिल्ली में रह रहा एक सामान्य व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 40 सिगरेट के बराबर धुआं-धूल अपने शरीर के अंदर ले रहा है। इसका व्यक्ति की सांस की नली, फेफड़े और शरीर के दूसरे हिस्सों में असर पड़ना तय है। सांस के माध्यम से हम ऑक्सीजन अपने शरीर के अंदर लेते हैं, जिसका उपयोग करते हुए शरीर कार्य करता है। प्रदूषण के कणों की अधिकता के कारण पूरी सांस में ऑक्सीजन की कमी होगी। इसका लोगों की कार्य क्षमता पर असर पड़ सकता है। जो लोग मानसिक तौर पर काम करते हैं, प्रदूषण से उनकी रचनात्मक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
प्रदूषण से बचाव के लिए, बाहर निकलने से पहले एन-95 या प्रदूषण को रोकने में सक्षम मास्क पहनें। आंखों पर चश्मा लगाएं। यदि नजर के चश्मे न पहनते हों तो आंखों में प्रदूषण के कारण होने वाली जलन को कम करने के लिए साधारण चश्मा पहनें। दिन में बीच-बीच में आंखों को पानी से धोते रहें। वायु प्रदूषण के तत्व नाक, गले और फेफड़े में जाकर फंसते हैं। वे इन्हीं हिस्सों को सबसे ज्यादा असर करते हैं। ऐसे में इन अंगों की सफाई करें। दिन में गर्म पानी के गरारे करते रहें। यदि शाम के समय गर्म पानी से स्नान कर सकें, तो यह पूरे शरीर के लिए बेहतर होगा।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ एवं कैंसर सर्जन डॉ. अंशुमन कुमार ने अमर उजाला के साथ बातचीत में कहा, दिल्ली में प्रदूषण की खतरनाक स्थिति के मद्देनजर लोगों की सांसे भी फूलने लगी हैं। हर साल इस मौसम में दिल्ली में लोगों को वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ता है। दूसरी तरफ सरकार अपनी पॉलिसी और आरोप प्रत्यारोपों का बखान करती हैं। कभी तो पराली को प्रदूषण का मुख्य कारण बताया जाता है तो कभी पटाखों से निकलने वाले धुएं को। वायु प्रदूषण, जन्म से लेकर जिंदगी के आखिरी दिन तक इंसान पर प्रभाव डालता है। जब कोई व्यक्ति मां के पेट में होता है तभी से उसके शरीर पर वायु प्रदूषण का असर होने लगता है और अंतिम समय तक इसका प्रभाव शरीर पर रहता है। जिन इलाकों में वायु प्रदूषण अधिक होता है, वहां ऐसी स्थिति देखने को मिलती है। गर्भवती महिला में सांस के जरिए प्रदूषण के कण शरीर में चले जाते हैं। इसके बाद ये कण प्लेसेंटा की सुरक्षा को पार करते हुए भ्रूण के अंगों में भी जगह बना रहे हैं। ये कण बच्चे के शरीर में चले जाते हैं और कई बीमारियों का कारण बनते हैं।
डॉ. अंशुमन के मुताबिक, दिल्ली का वायु प्रदूषण, शरीर के कई अंगों पर एक साथ असर करता है। इसका सबसे ज्यादा असर फेफड़ों पर होता है। इससे लंग्स कैंसर हो जाता है। प्रदूषण के कारण नॉन स्मॉल लंग्स कैंसर, स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा होता है। हर साल ऐसे कई केस देखने को मिलते हैं जिनमें स्मोकिंग को कोई हिस्ट्री नहीं होती है, लेकिन फिर भी वो लोग लंग्स कैंसर का शिकार हो जाते हैं। इसका कारण वायु प्रदूषण ही होता है। इसके अलावा ये प्रदूषण हार्ट की बीमारियों को भी बढ़ा देता है। प्रदूषण में मौजूद छोटे-छोटे कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं और ये ब्लड में भी जा सकते हैं। इससे हार्ट की आर्टरी में सूजन आने के साथ कुछ मामलों में ब्लॉकेज की समस्या भी हो सकती है। जो बाद में हार्ट अटैक का कारण बनती है। अगर किसी को पहले से ही अस्थमा है तो उस व्यक्ति के प्रदूषण के संपर्क में आने से ये बीमारी काफी बढ़ जाती है। वायु प्रदूषण का लेवल बढ़ने से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और सीओपीडी के मामले काफी बढ़ जाते हैं।