दशकों से अर्धसैनिक बलों में हवलदार को मेजर बोले जाने की जो परपंरा चली आ रही है, अब उस पर विराम लग गया है। हवलदार को अब हजूर या उस्ताद कहना होगा। बताया जा रहा है कि सेना ने हवलदार को मेजर बोलने पर ऐतराज जताया था। सरकार ने अर्धसैनिक बलों को पत्र लिखकर बता दिया है कि भविष्य में इसका ध्यान रखा जाए।हवलदार को कोई भी मेजर नहीं कहेगा।
बता दें कि आजादी के बाद से ही अर्धसैनिक बलों में हवलदार के पद पर कार्यरत व्यक्ति को मेजर कहा जाता रहा है। सीआरपीएफ, बीएसएफ, एसएसबी और आईटीबीपी में हवलदार को उसके समकक्ष ही नहीं, बल्कि सिपाही भी बड़े सम्मान के साथ मेजर कह कर बुलाते रहे हैं।
बाकायदा सीआरपीएफ के मैनुअल में जीसी एंड बटालियन ऑफिसर हैंडबुक में हवलदार मेजर शब्द लिखा गया है। सिपाही, लांस नायक या नायक जैसे पदों पर कार्यरत जवान हवलदार को ही अपना खास हमदर्द मानते हैं। अगर उन्हें कोई भी बात आला अफसरों तक पहुंचानी होती है, छुटी लेनी है, कोई और काम है तो वे हवलदार के पास ही जाते हैं।
नीचे के रैंक वाले हवलदार को बड़े भाई जैसा दर्जा देते हैं। वे सम्मान के साथ जब हवलदार को मेजर बुलाते हैं तो उसके साथ साहब भी लगाते हैं। जब हवलदार को मेजर साहब कह कर बुलाया जाता है तो वह उत्साह व खुशी महसूस करता है। ऐसे में हवलदार अपने से नीचे रैंक वालों की बात न केवल गौर से सुनते हैं, बल्कि अपनापन का अहसास लिए वे उनका समाधान भी करते हैं। अब देखने वाली बात होगी कि हवलदार खुद को मेजर की बजाए हजूर या उस्ताद कहलवाने में कैसा महसूस करेंगे।