रामायण और पुराणों में श्रवण कुमार की कथा आती है जिसमें दशरथ द्वारा शब्दभेदी बाण से मारे जाने से पूर्व कांवड़ में बैठाकर वह अपने अंधे माता-पिता को तीर्थाटन कराया करते थे। बरेली निवासी फकीरचंद मौजूदा दौर में श्रवण कुमार की याद दिलाते हैं।
कांवड़ में बैठाकर वह भी अपनी सौ वर्षीया माता भागवती देवी को बरेली से हरिद्वार तक की यात्रा पर ले जा रहे हैं। जो भी फकीरचंद की मातृभक्ति को देख रहा है वह उन्हें बिना सराहे नहीं रहता। फकीर चंद की इस पुनीत यात्रा में एक युवक भी सहायक की भूमिका निभा रहा है।
न्यूक्लियस फेमिली के दौर में बूढ़े मां-बाप की उपेक्षा की तमाम खबरें आती रहती हैं। वृद्धाश्रम और अनाथालयों में बुजुर्गों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। इस दौर में बरेली के फकीर चंद जैसे लोग अपनी मातृभक्ति से समाज के लिए उम्मीद की मशाल रौशन कर रहे हैं।
संन्यास ग्रहण कर चुके फकीर चंद की मां भागवती देवी सौ वर्ष से ज्यादा आयु की हो चली हैं। एक दिन यूं ही फकीर चंद के दिमाग में आया कि अपनी बूढ़ी मां को तीर्थयात्रा कराएं। लेकिन वह कुछ ऐसा करना चाहते थे कि उनके काम से अन्य लोगों को भी माता-पिता की सेवा की प्रेरणा मिले।
उन्होंने कंधे पर कांवड़ ढोकर मां को तीर्थयात्रा कराने की ठानी। लेकिन इस काम में एक सहयोगी की जरूरत थी। उन्होंने इलाके के ही एक युवक तेज प्रकाश से बातचीत की। तेजप्रकाश इस पावन यात्रा के लिए तैयार हो गए।
बस ऐसे शुरू हुई मां की हरिद्वार यात्रा। फकीरचंद ने यह यात्रा 28 जुलाई से शुरू की थी। सोमवार सावन की शिवरात्रि को जब मां को ढो रही फकीरचंद की अनूठी कांवड़ रामपुर से गुजरी तो हर शख्स उनकी मातृभक्ति का मुरीद हो गया।