शोधकर्ताओं ने बारहवीं सदी के मानव कंकालों के अवशेषों के विश्लेषण से पता लगाया है कि तम्बाकू का सेवन इंसानों के हड्डियों की बाहरी परत पर एक स्थायी निशान अंकित कर देता है, जो मौत के लंबे समय बाद भी सलामत रहता है।
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तम्बाकू का सेवन इंसानों के कॉर्टिकल बोन पर एक स्थायी निशान छोड़ देता है। यह मानव कंकाल की संरचना को भी बदल देती है। ये निशान इतने गहरे होते हैं कि वह मृत्यु के सदियों बाद भी हड्डियों पर बने रहते हैं। मानव कंकाल पर तम्बाकू के प्रभावों को लेकर यूनिवर्सिटी ऑफ लीसेस्टर से जुड़े वैज्ञानिकों ने 12वीं से 19वीं शताब्दी के कंकालों का अध्ययन करके यह खुलासा किया है। इसके नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुए हैं।
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शोधकर्ताओं ने बारहवीं सदी के मानव कंकालों के अवशेषों के विश्लेषण से पता लगाया है कि तम्बाकू का सेवन इंसानों के हड्डियों की बाहरी परत पर एक स्थायी निशान अंकित कर देता है, जो मौत के लंबे समय बाद भी सलामत रहता है। कॉर्टिकल बोन एक तरह के घने टिश्यू होते हैं, जो हड्डियों की बाहरी परत को बनाते और मजबूती प्रदान करते हैं। शारीरिक प्रणाली में इनकी भी भूमिका निर्णायक होती है।
प्रतिबंध से बचा सकते हैं हर साल 12 लाख जानें
तम्बाकू पर प्रतिबन्ध की मदद से फेफड़ों के कैंसर से होने वाली 11,86,500 मौतों को रोका जा सकता है, लेकिन यदि पिछले 15 वर्षों के दौरान यही प्रवृत्ति जारी रहती है तो वैश्विक स्तर पर 2006 से 2010 के बीच जन्मे करीब 29.5 लाख लोगों की मौत फेफड़ों के कैंसर से हो सकती है। यदि हम युवा पीढ़ी को तम्बाकू के जहर से बचा पाने में सफल होते हैं तो फेफड़ों के कैंसर से होने वाली 40 फीसदी से ज्यादा मौतों को टाल सकते हैं। यानी लगभग 12 लाख जिंदगियों को बचाया जा सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी रिपोर्ट ‘ग्लोबल रिपोर्ट ऑन ट्रेंड्स इन प्रीवलेंस ऑफ टोबैको यूज 2000-2030’ में बताया है कि भारत सहित दुनिया भर में तम्बाकू का सेवन करने वालों की संख्या में कमी आई है। इसके बावजूद भारत में अभी भी 25.1 करोड़ से ज्यादा लोग इसका सेवन कर रहे हैं। इनमें 79 फीसदी पुरुष और और 21 फीसदी महिलाएं हैं। यानी भारत में अभी भी 19.8 करोड़ से ज्यादा पुरुष और 5.3 करोड़ महिलाएं तम्बाकू का सेवन करती हैं।