खुद लड़नी होगी अपनी लड़ाई
पूर्व विदेश सचिव शशांक ने कहा कि अभी तक अमेरिका ने किसी देश का साथ नहीं दिया है। लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ बने तनाव के बीच अभी तक अमेरिका ने कोई खास संकेत नहीं दिया है। इसलिए अभी तो कहने के लिए ठीक है कि अमेरिकी राष्ट्रपति, वहां के विदेश मंत्री और रक्षा मंत्री समेत सब भारत के पक्ष में बयान दे रहे हैं, लेकिन इसका आशय यह नहीं है कि अमेरिका चीन के खिलाफ कार्रवाई में आगे आकर साथ देगा।
शशांक ने कहा कि यह तभी संभव है, जब अमेरिका एशिया में भारत को अपना मुख्य और सबसे बड़ा रणनीतिक साझीदार माने। इसलिए अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी पड़ेगी।
शशांक का कहना है कि इसलिए जरूरी है कि चीन की पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित, बालटिस्तान और अक्साई चिन से होकर गुजरने वाली सड़क परियोजना को ध्यान में रखकर दबाव बनाया जाए। जब तक चीन को भारत झटका नहीं देगा, तब तक पड़ोसी देश मानने वाला नहीं है।
चीन की मंशा एलएसी का प्रारुप बदलने की है
पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह का कहना है कि चीन की मंशा एलएसी का प्रारुप बदलने की है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी कहना है चीन ने सधे हुए तरीके से घुसपैठ की है। अब उसने क्षेत्र में स्थाई सैन्य संरचना, तंबू, बंकर सब खड़ा कर लिया है।
पड़ोसी देश की सेना पैंगोंग और डेपसांग से हटने का नाम नहीं ले रही है। मतलब साफ है कि चीन के सैनिक इस बार कब्जा जमाने के इरादे से आए हैं। पूर्व विदेश सचिव ने कहा कि रक्षा मंत्री के लद्दाख से दिए बयान पर गौर करिए। यह बयान खुद ही स्थिति की जटिलता का ईशारा कर रहा है।
टकराव के संदेश से बात बन जाए तो अच्छा है
भारतीय रणनीतिक और सामरिक जानकारों का कहना है कि सैन्य कूटनीति, वर्किंग मैकेनिज्म और टकराव का संदेश देने से चीन की सेना पीछे हट जाए, तो अच्छा है। हालांकि अब इसकी गुंजाइश कम दिखाई दे रही है। पूर्व विदेश सचिव का कहना है कि लद्दाख में मौजूदा आक्रामक तैयारी या वायुसेना की कमांडर कांफ्रेंस में सैन्य बलों को चुनौती के लिए तैयार रहने का संदेश देकर क्या हासिल होगा। मुझे तो लग रहा है कि मामला धीरे-धीरे जटिल होता जा रहा है।