- शेषन का पूरा नाम तिरुनेलै नारायण अय्यर शेषन था।
- वह भारत के दसवें चुनाव आयुक्त रहे।
- उन्होंने 1990 से 1996 के दौरान चुनाव प्रणाली को मजबूत बनाया।
- इसकी बदौलत चुनाव प्रणाली की दशा और दिशा बदल गई।
- उस वक्त यह कहा जाता था कि नेताओं को या तो भगवान से डर लगता है या फिर शेषन से।
के आर नारायणन के खिलाफ लड़ा राष्ट्रपति पद का चुनाव
टीएन शेषन तमिलनाडु कार्डर के 1995 वैज के आईएएस अधिकारी थे। चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी निभाने से पहले वह सिविल सेवा में थे। वह स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे कम वक्त तक सेवा देने वाले कैबिनेट सचिव बने। 1989 में वह सिर्फ आठ महीने के लिए कैबिनेट सचिव बने। शेषन ने के आर नारायणन के खिलाफ राष्ट्रपति पद का चुनाव भी लड़ा। वह तब के योजना आयोग के सदस्य भी रहे।
शेषन के बारे में उस वक्त प्रसिद्ध था कि वह जरा-सा शक होने पर चुनाव रद्द कर देते थे। उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे और चुनाव हो रहा था। बिहार में तब सबसे ज्यादा फर्जी वोट पड़ने और बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं होती थी। शेषन ने पूरे सूबे को अर्धसैनिक बलों से पाट दिया।
संकर्षण ठाकुर अपनी किताब 'द ब्रदर्स बिहारी' में लिखते हैं कि लालू प्रसाद यादव अपने जनता दरबार में टीएन शेषन को खूब कोसते थे। वह अपने हास्य और व्यंग्य के लहजे में कहते थे- शेषनवा को भैंसिया पे चढ़ाकर गंगाजी में हेला देंगे। शेषन 11 दिसंबर 1996 तक चुनाव आयुक्त रहे और इस दौरान भारत का चुनाव आयोग सबसे ज्यादा शक्तिशाली और मजबूत हुआ।
उस वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे थे। लालू यादव फिर से कुर्सी पर बैठने की राह ताक रहे थे। शेषन ने सूबे में सुरक्षा व्यवस्था को इतना मजबूत कर दिया था कि बिहार में चुनाव प्रक्रिया तीन महीने तक चली। यह पहली बार था जब बिहार में पिछले चुनावों के मुकाबले कम हिंसा हुई और फर्जी वोट भी कम पड़े।