आईएएस की परीक्षा टॉप करने के बाद शेषन मद्रास (अब चेन्नई) के परिवहन निदेशक बने। नियमों का पालन उचित तरीके से हो, इसकी धुन उन्होेंने अपनी इस नियुक्ति में ही दिखा दी। पूरा दिन मद्रास की सड़कों पर 3 हजार सरकारी बसों के बेड़े का खुद निरीक्षण करते घूमते रहना। एक दिन ड्राइवरों ने हड़ताल कर दी।
शेषन खुद मैदान में उतरे और एक बस में डिपो से सवारियां भरकर 80 किलोमीटर दूर उनकी मंजिल तक पहुंचाया। हड़ताली ड्राइवरों को भी उनके इस जज्बे की तारीफ करनी पड़ी।
हालांकि उनकी इस ड्राइविंग के पीछे एक किस्सा यह भी है कि पूरा दिन सड़कों पर निरीक्षण करने के दौरान एक ड्राइवर ने उन्हें यह कह दिया था कि आप न इंजन के बारे में जानते हैं और न ही बस चलाना, तो हमारी परेशानी भी नहीं समझ पाएंगे। शेषन ने इस बात को चैलेंज माना और रोजाना वर्कशॉप में जाकर बस ड्राइविंग सीखने के साथ ही उसे ठीक करना भी सीख लिया।
रेड्डी के मुख्यमंत्री पद पर पड़ गए थे भारी
टीएन शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद बहुत समय तक कांग्रेसी कहा जाता रहा। इससे नाराज शेषन ने कांग्रेस को ही दो बार आयोग की ताकत खूब दिखाई। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस ने विजय भास्कर रेड्डी को मुख्यमंत्री बना दिया। उन्हें छह महीने के अंदर उपचुनाव जीतकर विधानसभा की सदस्यता लेनी थी, लेकिन शेषन ने अकेले आंध्र प्रदेश के लिए उपचुनाव कराने से स्पष्ट इनकार कर दिया।
इसके बाद 1993 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस की जिद के बावजूद शेषन ने फरवरी महीने में नहीं होने दिए थे। उन्होंने राज्य के दबंग कांग्रेसी नेता व केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देब के साथ चुनाव प्रचार में घूमने वाले पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई होने तक चुनाव स्थगित रहने की बात कही। खींचतान के बाद सरकार ने पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की। इसके बाद ही अप्रैल में चुनाव कराए गए।
शेषन को चुनाव आयोग से दूर करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने उन्हें अमेरिका में भारतीय राजदूत बनने का ऑफर दिया। शेषन ने इससे इनकार कर दिया। बाद में एक अखबार से बातचीत के दौरान शेषन ने कहा था कि मुझे उपहार में सिर्फ गणेश की मूर्तियां भाती हैं, क्योंकि मैं खुद भी गणेश जैसा ही दिखता हूं।
पहले आईपीएस और फिर बने आईएएस
शेषन के बड़े भाई टीएन लक्ष्मीनारायण देश की आजादी के बाद आईएएस के पहले बैच के टॉपर थे, लेकिन खुद शेषन को नौकरशाही पसंद नहीं थी। वह बनना चाहते थे वैज्ञानिक। इसके लिए बीएसएसी फिजिक्स करने के बाद एक कॉलेज में शिक्षक भी बने।
लेकिन खुद शेषन ने ही एक जगह लिखा कि घर चलाने लायक भी वेतन नहीं था तो सोचा कुछ और किया जाए। कोई दूसरा काम जानता नहीं था, इसलिए सिविल सेवा परीक्षा की ही तैयारी शुरू कर दी। 1953 में टीएन शेषन ने पहली बार सिविल सेवा परीक्षा पास की और आईपीएस बने।
लेकिन उन्हें खाकी वर्दी नहीं भायी। नतीजतन अगले साल फिर सिविल सेवा परीक्षा में बैठे और महज 21 साल की उम्र में आईएएस के लिए पूरे देश में शीर्ष पर चुने गए।
शेषन के पिता वकील थे, लेकिन परिवार में वे छह भाई-बहनों के बीच सबसे छोटे थे। बड़ा परिवार होने के चलते पैसे की किल्लत रहती थी। बचपन के बारे में शेषन ने लिखा है, केरल के ब्राह्मण कुल के मेरे परिवार में लोग या तो नौकरशाह बनते थे या संगीताकार, रसोइया या फिर ठगी में इस कुल ने नाम कमाया था यानी मैं ठगों के खानदान से हूं।
शेषन ने बताए संविधान के महापर्व के नियम कायदे
नब्बे के दशक में केंद्र में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर की सरकार बनी तो सिर्फ चार महीने ही चल पाई। समझा जाता है कि इस दौरान राजीव गांधी के दबाव में ही चंद्रशेखर ने तत्कालीन कैबिनेट सचिव टी. एन. शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया था।
लेकिन शेषन ने पद संभालते ही साबित कर दिया कि वह किसी पार्टी की तरफदारी नहीं करने वाले हैं। उनके बुलंद इरादों और सख्ती का एक वाक्य मार्च 1991 में अखबारों में छप चुका था, भूल जाइए कि संसद में गलत तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके आप पहुंच जाएंगे, किसी का ऐसा करने की इजाजत नहीं होगी।