इस चुनाव में देश की हर चौपाल पर सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल पर थी। राज्य की सत्ता हासिल करने के लिए भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक को प्रचार में उतारने समेत अपनी सारी ताकत झोंक दी थी।
इसके बावजूद सत्तारूढ़ टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी पुराना प्रदर्शन दुहराते हुए जीत की हैट्रिक लगाने में कामयाब रही। देर शाम तक सामने आए परिणामों में टीएमसी ने 292 में से बहुमत के लिए आवश्यक 147 की जादुई संख्या से कहीं ज्यादा 202 सीट हासिल की, जबकि भाजपा तमाम कोशिशों के बावजूद 81 सीटों तक सिमटकर तीन अंकों से भी दूर रह गई।
भाजपा को 38.7 फीसदी, जबकि टीएमसी को 48.3 फीसदी वोट मिले। सबसे बड़ा आश्चर्य बंगाल में कई दशक तक लगातार सत्ता में रहे वाम दलों और कांग्रेस का तकरीबन पूरी तरह सफाया हो जाना भी रहा है।
असम ने दी भाजपा को मुस्कुराहट
पश्चिम बंगाल और केरल की तरह असम में भी मतदाताओं ने सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए पर ही भरोसा जताया। पश्चिम बंगाल में हार के दर्द के बीच असम ने भाजपा को मुस्कुराने का मौका दिया।
हालांकि बीते विधानसभा चुनाव के मुकाबले भले ही भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए की सीटों में कमी आई, लेकिन कांग्रेस की अगुवाई में बने बड़े गठबंधन की 46 सीटों के मुकाबले एनडीए ने 126 में से 75 सीटों पर निर्णायक बढ़त बनाकर आरामदायक तरीके से बहुमत हासिल कर लिया।
भाजपा को जहां 56 सीटें मिलीं, वहीं उसकी सहयोगी अगपा को 11 और यूपीपीएल को 8 सीटें हासिल हुईं। महागठबंधन में कांग्रेस के खाते में 29 सीट आईं। असम में जीत से राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री हेमंत बिस्वासरमा का सियासी कद बढ़ गया है।
उम्मीद जताई जा रही है कि पार्टी वर्तमान सीएम सर्वानंद सोनोवाल की जगह बिस्वासरमा को सरकार की कमान देगी। हालांकि सोनोवाल ने गठबंधन की सफलता को अपने लिए जनता का आशीर्वाद बताया है।
हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन केरल की राजनीतिक परंपरा बन गई थी। लेकिन इस बार वाम दलों के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने करीब चार दशक से चली आ रही इस परंपरा को तोड़कर अपनी सत्ता बरकरार रखने का इतिहास रच दिया।
एलडीएफ ने 140 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत से दो सीट ज्यादा 73 पर जीत हासिल की और सत्ता पाने का ख्वाब देख रहे कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब देश में केरल ही इकलौता राज्य है, जहां वाम दलों की सरकार बची है। हालांकि इस बार केरल में भी पश्चिम बंगाल की तरह बेहद दमखम दिखा रही भाजपा को महज एक सीट से ही संतोष करना पड़ा।
तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन
तमिलनाडु में एमके स्तालिन के नेतृत्व में द्रमुक ने सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक को करारी शिकस्त दी है। इससे सत्ताधारी दल के सत्ता में वापसी करने की परंपरा भी टूट गई है। द्रमुक को 234 सीटों में से अन्नाद्रमुक (80) के मुकाबले 121 पर जीत मिली है, जबकि उसकी सहयोगी कांग्रेस ने 16 सीट हासिल की हैं।
द्रमुक और अन्नाद्रमुक इन चुनावों में पहली बार अपने-अपने दिग्गज नेताओं एम. करुणानिधि और जे. जयललिता के बिना उतरी थीं। लेकिन इस परिणाम के साथ ही न सिर्फ द्रमुक में करुणानिधि की विरासत पर स्तालिन के कब्जे पर मुहर लगी है, बल्कि उनके ही मुख्यमंत्री बनने की संभावना है। अन्नाद्रमुक की सहयोगी भाजपा को यहां भी महज तीन सीटों पर ही जीत हासिल हुई।
हवा में उड़े कोविड प्रतिबंध
निर्वाचन आयोग की तरफ से कोरोना महामारी को ध्यान में रखकर विजय जुलूसों और वाहन रैलियों पर लगाया गया प्रतिबंध कई जगह हवा में उड़ता दिखाई दिया। विभिन्न दलों के समर्थकों की भीड़ अपने-अपने उम्मीदवारों की जीत पर जश्न मनाती दिखाई दीं।
यह बंगाल की जीत और केवल बंगाल ऐसा कर सकता है : ममता
हमारे लिए कोविड-19 के हालातों से लड़ना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। यह बंगाल की जीत है और केवल बंगाल ऐसा कर सकता है।
- ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री, पश्चिम बंगाल
टीएमसी नहीं ममता की जीत : विजयवर्गीय
टीएमसी केवल ममता बनर्जी के कारण जीती है। ऐसा लगता है कि लोगों ने दीदी को चुना। हम आत्ममंथन करेंगे कि क्या गलती रही, क्या यह संगठन से जुड़ी समस्या थी या किसी चेहरे की कमी या पार्टी के अंदर बाहरी-भीतरी की बहस।
- कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रीय महासचिव, भाजपा
हम केरल की जनता का यह विश्वास दिखाने के लिए धन्यवाद देते हैं। यह एलडीएफ सरकार की तरफ से लोगों के सामने महामारी के कारण आई चुनौतियों से निपटने के लिए उठाए गए कदमों में अभूतपूर्व तरीके से जताया विश्वास है। राज्य सरकार ने विश्व को महामारी से निपटने के लिए ‘केरल मॉडल’ दिया है।
- सीताराम येचुरी, महासचिव, माकपा