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तिनका-तिनका तृणमूल: बागियों पर दलबदल विरोधी कानून भी बेअसर, क्या कांग्रेस में होगी घर वापसी?

अमर उजाला नेटवर्क, कोलकाता। Published by: राकेश कुमार Updated Wed, 10 Jun 2026 07:03 AM IST

सार

पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर होते ही तृणमूल कांग्रेस अस्तित्व के संकट में घिर गई है। विधानसभा के बाद अब यह बगावत संसद तक पहुंच चुकी है, जहां बागी विधायकों और सांसदों का आंकड़ा दलबदल विरोधी कानून के दो-तिहाई के नियम को भी पार करता दिख रहा है। ममता बनर्जी के करिश्माई नेतृत्व के बावजूद संगठनात्मक कमजोरी के कारण पार्टी बिखर रही है। 
 
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ममता बनर्जी, मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल - फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स


पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ यही हो रहा है। सत्ता से बाहर होने के बमुश्किल एक महीने बाद ही उसे अपने ज्यादातर विधायकों व सांसदों की बगावत का सामना करना पड़ रहा है। ममता के लिए यह एक बड़ा झटका इसलिए भी है, क्योंकि बागी समूह का आकार संविधान की दसवीं अनुसूची, जिसे आमतौर पर दलबदल विरोधी कानून के रूप में जाना जाता है, के तहत अयोग्यता से सुरक्षा के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े को पार करता दिख रहा है। लिहाजा तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती सिर्फ खोई हुई चुनावी जमीन पाने तक सीमित नहीं, बल्कि उससे भी बड़ी परीक्षा अपनी राजनीतिक पहचान बनाए रखने की है। 


इसमें संदेह नहीं कि ममता बनर्जी ने अपने संघर्ष के बल पर तृणमूल कांग्रेस को खड़ा किया और पश्चिम बंगाल की राजनीति में वामपंथी प्रभुत्व का अंत किया। लेकिन, राजनीतिक इतिहास यह भी बताता है कि किसी भी दल का भविष्य केवल करिश्माई नेतृत्व पर निर्भर नहीं रह सकता। समय के साथ संगठनात्मक संस्थाओं को मजबूत करना, दूसरी पंक्ति के नेतृत्व को तैयार करना और असहमति को समायोजित करने की क्षमता विकसित करना भी उतना ही जरूरी होता है। तृणमूल कांग्रेस का संकट पहले से ही नेतृत्व, रणनीति और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं के सवालों से जूझ रहे इंडिया गठबंधन के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। इससे न केवल संसद के भीतर विपक्ष की संख्या और प्रभाव घट सकता है, बल्कि भाजपा के मुकाबले एक व्यापक और विश्वसनीय राजनीतिक विकल्प प्रस्तुत करने की उसकी क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। 


दिलचस्प यह है कि जिस कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन हुआ था, अब उसी की ओर से ममता बनर्जी को कथित तौर पर घर वापसी का प्रस्ताव दिया गया है। दरअसल, कांग्रेस बिल्कुल नहीं चाहेगी कि पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोट वाम दलों और तृणमूल के बिखरे धड़ों में बंट जाएं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में कभी परिवर्तन का प्रतीक बनकर उभरी तृणमूल कांग्रेस का मौजूदा संकट केवल उसकी राजनीतिक प्रासंगिकता का नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व और विपक्षी राजनीति में उसकी भावी भूमिका का भी है। आने वाले दिनों में पार्टी इस चुनौती का सामना कैसे करती है, यही उसके भविष्य की दिशा तय करेगा।
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