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TMC: क्या ममता निकाल पाएंगी हल? हार के बाद इस्तीफों का दौर, आंतरिक कलह से बिखराव के मुहाने पर तृणमूल कांग्रेस

सार

पश्चिम बंगाल में चुनावी झटके के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। नेताओं के इस्तीफे, सांसदों के बीच विवाद और संगठनात्मक मतभेदों ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। कई वरिष्ठ नेताओं के सार्वजनिक बयानों से आंतरिक तनाव और स्पष्ट हुआ है। हालात संभालने के लिए पार्टी नेतृत्व ने कालीघाट में एक अहम बैठक बुलाई है।
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तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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विधानसभा चुनाव में हार के बाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस अब अपने सबसे गंभीर संगठनात्मक दबाव के दौर से गुजरती दिख रही है। पार्टी के भीतर लगातार सामने आ रहे इस्तीफों, वरिष्ठ नेताओं के बीच बढ़ते टकराव और सार्वजनिक बयानबाज़ी ने हालात को इस स्तर तक पहुंचा दिया है कि संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
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राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज है कि पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के सामने यह स्थिति केवल असंतोष नहीं, बल्कि धीरे-धीरे उभरता हुआ संगठनात्मक बिखराव बनती जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, हालिया दिनों में सामने आए इस्तीफों, कुछ विधायकों की संदेहजनक गतिविधियों, आरोप-प्रत्यारोप और अलग-अलग स्तर पर असहमति जैसे घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर भरोसे और संवाद की कड़ी को कमजोर किया है।

स्थिति यह संकेत दे रही है कि यदि जल्द ही संगठनात्मक स्तर पर सख्त और निर्णायक हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो यह आंतरिक तनाव आगे चलकर पार्टी की कार्यप्रणाली और राजनीतिक रणनीति दोनों पर असर डाल सकता है। इसी बिखराव को रोकने के लिए आगामी रविवार को कालीघाट स्थिति ममता बनर्जी के आवास पर पार्टी को एकजुट बनाए रखने के लिए वरिष्ठ टीएमसी नेता और नेता प्रतिपक्ष शोभनदेव भट्टाचार्य ने एक बैठक बुलाई है।
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इस्तीफों और असंतोष से बढ़ी अंदरूनी हलचल
पार्टी के भीतर हाल के दिनों में विभिन्न स्तरों पर इस्तीफों और असंतोष के मामले लगातार सामने आए हैं। इनमें प्रवक्ता पद से शांतनु सेन का इस्तीफा प्रमुख माना जा रहा है। उन्होंने अपने पत्र में आरजी कर मेडिकल कॉलेज प्रकरण और चुनावी हार के बाद बने राजनीतिक माहौल का उल्लेख किया है। इसके अलावा संगठन के भीतर पार्षदों और विधायकों के पद छोड़ने तथा कई नेताओं के संगठनात्मक पदों से दूरी बनाने की घटनाओं ने भी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। इन घटनाओं को पार्टी के भीतर गहराते असंतोष के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

कल्याण–काकोली विवाद लोकसभा स्पीकर तक पहुंचा
पार्टी के भीतर सबसे बड़ा टकराव सांसद कल्याण बनर्जी और सांसद काकोली घोष दस्तिदार के बीच सामने आया है। सूत्रों के अनुसार, काकोली घोष दस्तिदार ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर कल्याण बनर्जी पर महिला सांसदों के प्रति कथित अपमानजनक व्यवहार का आरोप लगाया है और कार्रवाई की मांग की है।इसके जवाब में कल्याण बनर्जी ने काकोली घोष दस्तिदार पर नारदा प्रकरण सहित पुराने मामलों का हवाला देते हुए पलटवार किया है। दोनों नेताओं के बीच यह विवाद अब लोकसभा स्तर तक पहुंच चुका है, जिससे पार्टी की आंतरिक खींचतान और अधिक खुलकर सामने आ गई है।

संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व शैली पर सवाल गहराए
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पार्टी के भीतर संगठनात्मक ढांचे, निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व शैली को लेकर मतभेद भी स्पष्ट होते जा रहे हैं। एक धड़ा मौजूदा कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है, जबकि दूसरा इसे अनुशासन और संगठनात्मक नियंत्रण का मामला बता रहा है। इसी बीच कुणाल घोष के बयान ने भी स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। उन्होंने कहा है कि संगठन के भीतर कई नेता मानसिक और राजनीतिक दबाव में काम कर रहे हैं, जिससे असहजता का माहौल बना हुआ है।

शोभनदेव चट्टोपाध्याय को संगठन संभालने की जिम्मेदारी
संगठनात्मक अस्थिरता के बीच पार्टी नेतृत्व ने वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधायकों को एकजुट रखने की अहम जिम्मेदारी सौंपी है। वे विपक्ष के नेता की भूमिका में भी हैं, जिससे उनकी राजनीतिक जिम्मेदारी और बढ़ गई है। इसी क्रम में रविवार को कालीघाट स्थित आवास पर विधायक दल की अहम बैठक बुलाई गई है, जिसमें सभी विधायकों की उपस्थिति अनिवार्य बताई गई है। बैठक में संगठनात्मक अनुशासन और विधायकों की एकजुटता को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए जाने की संभावना है

कालीघाट केंद्रित निगरानी में नेतृत्व
पार्टी सूत्रों के अनुसार, पूरी स्थिति पर कालीघाट स्थित नेतृत्व लगातार नजर बनाए हुए है और संगठनात्मक संतुलन को बनाए रखने के लिए रणनीतिक स्तर पर विचार-विमर्श चल रहा है। फिलहाल पार्टी की ओर से इस पूरे विवाद पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे तृणमूल कांग्रेस के लिए एक गंभीर संगठनात्मक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।

शक्ति-संरचना में बदलाव के संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तृणमूल कांग्रेस में सामने आ रहे ये घटनाक्रम केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं हैं, बल्कि यह संगठनात्मक पुनर्संतुलन और शक्ति-संरचना में बदलाव के संकेत हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, चुनावी हार के बाद नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और केंद्रीय बनाम क्षेत्रीय नियंत्रण को लेकर असहमति बढ़ी है। उनका यह भी मानना है कि यदि यह असंतोष नियंत्रित नहीं हुआ तो इसका असर पार्टी की जमीनी एकजुटता और आगामी राजनीतिक रणनीति पर भी पड़ सकता है।
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