भारत के दो ऐसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को बुधवार को प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेस पुरस्कार देने के लिए चुना गया जिनमें से एक को अपने परिवार की विरासत को जिंदा रखने के लिए तो दूसरे को अपने परिवार की विरासत में जारी कुप्रथा तोड़ने के लिए यह सम्मान मिला है।
चेन्नई के टी. एम. कृष्णा कर्नाटक संगीत के शास्त्रीय संगीतज्ञ और गायक हैं जिन्हें समाज के हर तबके तक शास्त्रीय संगीत पहुंचाने के लिए यह पुरस्कार दिया जाएगा। उनके पिता कारोबारी हैं जबकि मां कर्नाटक संगीत में स्नातक हैं और कई शिक्षण संस्थान संचालित करती हैं।
वहीं, कर्नाटक के बेजवाड़ा विल्सन दलित परिवार से हैं जिनके माता-पिता मैला ढोने का काम करते थे। विल्सन ने मां-बाप को विरासत में मिली इस कुप्रथा का समूल उन्मूलन करने का प्रण लिया और आज रेमन मैग्सेसे पुरस्कार उनकी इसी मेहनत का नतीजा है। इस पुरस्कार के लिए चार अन्य हस्तियों का चयन भी किया गया है।
मैग्सेसे कमेटी के मुताबिक, कृष्णा ने शास्त्रीय संगीत को निचले तबके, खासकर गैर-ब्राह्मण और दलित तबकों तक पहुंचाने का काम किया। उन्होंने यह भी घोषणा कर रखी थी कि जहां लोगों को टिकट लेना पड़े, वह ऐसे समारोह में नहीं गाएंगे।
चेन्नई में 1976 में जन्मे कृष्णा ने छह साल की उम्र से ही संगीत सीखना शुरू किया। दूसरी ओर, कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड में सन 1966 में जन्मे विल्सन जब 20 साल के हुए तो उन्हें पता चला कि सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा के कारण उनके समाज के बच्चे न तो पढ़ाई कर पा रहे हैं और न ही उनका जीवनस्तर ऊंचा हो पा रहा है।
मां-बाप की कमाई का बड़ा हिस्सा शराब में ही खर्च हो जाता है, क्योंकि शराब पिये बगैर उनके लिए सिर पर मैला ढोना मुश्किल था। विल्सन अपने परिवार में इकलौते स्नातक थे। अपने समाज की दुर्दशा देख उन्होंने सिर पर मैला ढोने के खिलाफ आंदोलन चलाया और तब जाकर सरकार ने सन 1993 में इसके खिलाफ कानून बनाया।