तिब्बत के क्रांतिधर्मी कवि एवं लेखक तेनजिन त्सुन्दू, जो लंबे समय से तिब्बत की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं, उन्होंने चीन को लेकर कई तरह के खुलासे किए हैं। त्सुन्दू का कहना है कि चीन द्वारा तिब्बत में लोगों को दलाई लामा का फोटो लगाने पर प्रताड़ित किया जाता है। पुलिस आसपास के 50-60 लोगों से पूछताछ करती है। एक गांव से अगर दूसरे गांव में जाना पड़े तो उसके लिए वीजा जैसी औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। इस प्रक्रिया में लोगों का बाकायदा रजिस्ट्रेशन होता है। तिब्बत में चीन जो कुछ कर रहा है, उसके आधार पर कह सकते हैं कि अब सीरिया के बाद तिब्बत का ही नंबर आता है। चीन की ज्यादतियों के खिलाफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए त्सुन्दू ने धर्मशाला से लेकर दिल्ली तक की पदयात्रा शुरू की है।
रविवार को अमर उजाला डॉट कॉम के साथ बातचीत करते हुए तेनजिन त्सुन्दू ने कहा, वे 20 फरवरी को आनंदपुर साहिब और 21 फरवरी को भारतगढ़ पहुंचे थे। उन्होंने 22 फरवरी को रूपनगर में लोगों से मुलाकात की है। इसके बाद 23 को कुराली, 24 को खरड़ और 25 फरवरी को चंडीगढ़ के रास्ते वे 10 मार्च को दिल्ली पहुंचेंगे। त्सुन्दू के मुताबिक, चीन 70 साल से तिब्बत में दमनकारी नीति जारी रखे हुए है।
भारत यह सोचकर कदम आगे नहीं रखता कि ये चीन का अंदरूनी मामला है। यूपीए और एनडीए की सरकार इसी प्रयास में लगी रही कि चीन से दोस्ती कर कुछ निवेश का फायदा मिल जाएगा। पिछले साल गलवां घाटी में चीन ने जो हरकत की है, उससे भारत का भरोसा काफी हद तक टूट चुका है। चीन की हकीकत भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के दूसरे देशों ने भी देखी है। वह हमेशा विश्वासघात करता है।
त्सुन्दू कहते हैं कि चीन, एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। वह ये बात अच्छी तरह जानता है कि भारत के पास उसकी राह रोकने के लिए पर्याप्त ताकत है। भारत को तिब्बत के मसले पर बोलना चाहिए। इससे भारत को और ज्यादा सशक्त होने का मौका मिलेगा। चीन ने तिब्बत की 25 हजार वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर रखा है।
बतौर तेनजिन, भारत और अमेरिका के बीच सुरक्षा एवं कारोबारी रिश्ते हैं। अमेरिका ने गत वर्ष नई तिब्बत नीति (तिब्बती नीति एवं समर्थन कानून 2020) को मंजूरी दी है। भले ही अमेरिका ने चीन के खिलाफ इस कानून को मंजूरी देकर एक कार्ड खेला है, लेकिन इससे ये बात तो साफ हो गई कि तिब्बत एक कब्जा किया हुआ देश है। अमेरिका इस कार्ड को खेलेगा तो यूरोप एवं दूसरे देश उसे अनुकरण करने लगेंगे। इसी क्रम में भारत को अब दलाई लामा को शरण देने की बात से आगे बढ़ना चाहिए।
तिब्बत, आज सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। बतौर त्सुन्दू, सीरिया के बाद अब तिब्बत का नंबर है। वहां पर आजादी को छीना जा रहा है। मीडिया, पर्यटन और दूसरे क्षेत्रों में आजादी नहीं बची है। चीन द्वारा पासपोर्ट जैसे जरूरी दस्तावेज जब्त किए जा रहे हैं। पुलिस ज्यादती करती है, मगर उसका विरोध नहीं कर सकते। चीन अपनी सुविधा वाले बौद्ध धर्म को लागू करना चाहता है। तिब्बत के स्कूल व कालेजों पर चीनी भाषा की पुस्तकें थोपी जा रही हैं।
चीन का मानना है कि जब तिब्बत की नई पीढ़ी को उसकी मूल भाषा से अलग कर दिया जाएगा तो धीरे-धीरे वहां के युवा चीन की सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा बनते जाएंगे। तिब्बतियों को घर में जो पढ़ाया जाता है, वह सब स्कूल-कालेज में नहीं होता। वहां चीनी भाषा में पढ़ाई कराते हैं। बच्चे असमंजस में रहते हैं कि वे घर की बात सुनें या सरकार की। त्सुन्दू कहते हैं, चीन इस बात का झूठा प्रचार करता है कि वह छह घंटे की क्लास में से एक घंटा तिब्बती भाषा सिखाने के लिए देते हैं।
अपनी पदयात्रा के बारे में उन्होंने कहा, कि वे केवल आम लोगों से बात कर रहे हैं। सड़क किनारे स्थित ढाबा, चाय वाला, मेकेनिक और दूसरे कामगारों के साथ बात करते हैं। उन्हें तिब्बत की आजादी और चीन की ज्यादातियों को लेकर बताते हैं। बहुत से लोगों को वस्तुस्थिति का ज्ञान नहीं होता, उन्हें विस्तार से समझाया जाता है। अंत में उन्होंने कहा, भारत को अपनी चीन नीति में बदलाव लाना होगा।