शोधकर्ताओं का कहना है कि जलवायु में बदलाव के कारण चरम घटनाओं में पूरे भारत में वृद्धि देखी जा रही है। आकाशीय बिजली गिरने की वजहों में से एक वायु प्रदूषण भी है। मानव जनित उत्सर्जन से तूफानों की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती है, जिससे आकाशीय बिजली गिरने की संभावना बढ़ जाती है। वर्ष 1967 से 2020 के बीच बिजली गिरने से 1,01,309 लोगों की मौत हुई।
खासकर 2010 से 2020 के बीच मौतों की संख्या में बहुत तेजी से वृद्धि हुई। हर एक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में औसत वार्षिक मौतें 1967 से 2002 के दौरान 38 से बढ़कर 2003 से 2020 के बीच 61 हो गई है। देश में वज्रपात के कारण हर साल औसतन 1,876 मौतें होती हैं। 29,804 यानी लगभग एक तिहाई मौतें वर्ष 2010 और 2020 के बीच हुई हैं। पहले चार दशकों में 71,505 मौतें दर्ज की गई।
इसलिए साल-दर-साल बढ़ रही हैं वज्रपात की जानलेवा घटनाएं
शोधकर्ताओं का कहना है कि ठंडी हवा और गर्म हवा जब मिलती है तो गर्म हवा ऊपर उठती है तब बादलों में कड़कड़ाहट पैदा होती है। ठंडी हवा में बर्फ के क्रिस्टल होते हैं और गर्म हवा में पानी की बूंदें होती हैं। तूफान के दौरान ये बूंदें और क्रिस्टल आपस में टकराते हैं और हवा में अलग हो जाते हैं।
बढ़ता तापमान बड़ी वजह
बिजली गिरने का मुख्य कारण तेजी से बढ़ता तापमान है। जब धूप से ज्यादा गर्मी होती है तो धरती से नमी वाली गर्म हवा ऊपर उठती है। गर्म हवा ठंडी हवा से ज्यादा घनी होती है, जिससे उसका असर ज्यादा होता है। गर्म हवा के ऊपर उठने से पानी की बूंदों में ऊर्जा प्रवाहित होती है। इस दौरान कुछ बादलों पर पॉजिटिव चार्ज हो जाता है तो कुछ पर निगेटिव चार्ज। आसमान में जब दोनों तरह के चार्ज वाले बादल एक दूसरे से ज्यादा टकराने लगते हैं तो लाखों वोल्ट की बिजली उत्पन्न होती है। वर्तमान में ऐसी परिस्थितियों ज्यादा निर्मित हो रही हैं। इसलिए आकाशीय बिजली की आवृत्ति और तीव्रता में लगातार वृद्धि होती जा रही है।