कर्ज के बोझ से डूबे सैकडों किसान अपना दर्द लेकर राजधानी पंहुचे। उम्मीद थी कि सरकार उनके दर्द को समझेगी। दिल्ली आकर पता चला कि सरकार उन्हें लागत का डेढ़ गुणा मूल्य दे रही है, लेकिन किस किसान को मूल्य मिला उन्हें पता नहीं। बात करने पर वे अपना दर्द ना छुपा सके और उनकी आंखों में आंसू छलक पड़े।
रैली में आए हर किसान के मुंह से एक ही बात निकल रही थी कि हमारा क्या कसूर। हम हक मांग रहे है। कहीं सूखा तो कहीं कर्ज के बोझ से दबे किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि वे भी आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए, इसी कारण हजारों मील दूर राजधानी में आकर हक की लड़ाई लड़ने आए हैं।
उत्तर-प्रदेश के शाहजहांपुर के किसान बलदेव सिंह (65) ने बताया कि सरकार ने उनकी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य तो तय कर दिया, लेकिन उनकी फसल को सरकार कभी नहीं खरीदती, जिस कारण उन्हें फसल को निजी मंडियों के आढ़तियों को बेचना पड़ता हैं। उन्होंने भावुक होकर बताया कि अगर ऐसा ही चलेगा तो उनके बच्चे कैसे फसलें उगाएंगे और कैसे अपना गुजारा करेंगे।
बिजनौर के किसान सूरवीर सिंह ने बताया कि किसानों का आज भी शोषण जारी है। सरकार ने कीटनाशकों से लेकर हर चीज पर महंगाई बढ़ा दी है, लेकिन फसल को हमेशा लागत से भी कम दाम पर बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। पुणे के किसानों ने कहा कि आर्थिक तंगी के कारण अब तक सैकड़ों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं, लेकिन सरकार मरने वाले किसानों के परिवारों या उनकी आर्थिक हालत के बारे में कोई सुध नहीं लेती।