वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पहली बार पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) घोटाले पर चुप्पी तोड़ी है, उन्होंने कहा है कि इसके लिए जिम्मेदार लोगों से सख्ती से निबटा जाएगा। उन्होंने इसे बैंक और ऑडिटर्स की चूक बताया है, लेकिन इसके बावजूद रिजर्व बैंक की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। इतना बड़ा घपला कई स्तरों पर लापरवाही, मिलीभगत या व्यवस्था की गड़बड़ी के कारण हुआ। इसमें अरुण जेटली की निगरानी में काम करने वाले कई विभागों की भी लापरवाही शामिल है। इस महाघोटाले में चूक के लिए अरुण जेटली को किस-किस के पेंच कसने होंगे।
वित्त मंत्रालय और कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय
आरबीआई, इनकम टैक्स, कॉर्पोरेट अफ़ेयर्स विभाग, फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट यानी एफआईयू और इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी), ये सभी केंद्र सरकार के अधीन हैं और इनकी चूक या उदासीनता की जिम्मेदार सरकार ही है। बैंकिंग सिस्टम की जिम्मेदारी है कि वह सन्देहास्पद लेन-देन के बारे में एफआईयू को बताए, जो उसे जाँच एजेंसी ईडी और इनकम टैक्स विभाग को भेजती है, जिनको इस पर कार्रवाई करनी होती है।
जब ऑडिटर्स किसी कंपनी की कार्यप्रणाली या कॉर्पोरेट गवर्नेंस में कमी पाते हैं तो कॉर्पोरेट अफेयर्स विभाग को इसकी जानकारी देते हैं, फिर मंत्रालय को उस पर कार्रवाई करनी होती है। कंपनी ऑडिटर डेलॉयट हेसकिन्स एन्ड शेल्स ने नीरव मोदी की मुख्य कंपनी फायरस्टार इंटरनेशनल में आय को खाते में दिखाने के मामले में कमजोर इंटरनल कंट्रोल की बात बताई थी, लेकिन कार्रवाई नहीं की गई।
अर्नस्ट एंड यंग ने पीएनबी के सिस्टम और कुछ अधिकारियों की क्षमता में कमी की रिपोर्ट दी थी। गीतांजलि ज्वैलर्स के ऑडिट में कंपनी पर आर्थिक दबाव और कर्ज को समय से न देने की रिपोर्ट दी गई थी, तो कमज़ोर और जोखिम भरे कॉर्पोरेट गवर्नेंस पर कार्रवाई होनी चाहिए थी। ईडी और इनकम टैक्स को पिछले 2-3 वर्षों में एफआईयू की रिपोर्ट पर एक्शन लेना था, लेकिन वहाँ भी ढिलाई हुई।
बैंक के कामकाज में गड़बड़ियां
अरुण जेटली
बैंकों में लेन-देन 'मेकर एंड चेकर्स' व्यवस्था पर होता है यानी कि लेन-देन का ब्योरा एक अधिकारी बनाएगा तो दूसरा उसे जांचेगा और तीसरा उसे अप्रूव करेगा। इसके बाद भी सतर्कता विभाग का अधिकारी इनके कामकाज पर नजर रखता है। बैंक का इंटरनल ऑडिट नियमित रूप से रक्षक की भूमिका अदा करता है, बैंक का हर लेन-देन 'सीबीएस' यानी कोर बैंकिंग सिस्टम पर दर्ज होना चाहिए और स्विफ्ट के जरिए हुआ लेन-देन इतने वर्षों से पकड़ में न आना हैरत की बात है।
स्विफ्ट के जरिेए अंतरराष्ट्रीय लेन-देन बड़े पैमाने पर होते हैं और ये लेन-देन अक्सर बड़ी धनराशि के होते हैं, जोखिम की संभावना के कारण बैंक हमेशा अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं, बिना पर्याप्त मार्जिन के एलओयू को बैंक अधिकारी स्विफ्ट के माध्यम से लगातार 6 वर्षों से भेजते रहे और किसी को भनक न लगी हो, ये अविश्वसनीय लगता है और बिना मिलीभगत के सम्भव नहीं हो सकता।
आरबीआई की चूक
टेक्नोलॉजी के इस युग मे इस बात पर हैरानी है कि स्विफ्ट के जरिए लेन-देन को इतने वर्षों तक सीबीएस का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया, जबकि ज़्यादातर निजी बैंक सारे कारोबार (स्विफ़्ट लेनदेन भी) सीबीएस से करते हैं और सारे लेन-देन रियल टाइम रिपोर्ट होते हैं। इसके अलावा, आरबीआई की एक्सपर्ट इंस्पेक्शन टीम ने समय-समय पर इस बैंक के लेन-देनों और कार्यप्रणाली की गहन जांच की होगी और छह वर्षों में ऐसा कई बार हुआ होगा, उन्हें भी इतने बड़े घोटाले की भनक नहीं लगी, ये हैरानी की बात है।
ऑडिटर्स क्या कर रहे थे?
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बैंक का कारोबार आरबीआई की निगरानी के अलावा, पाँच तरह की ऑडिट निगरानी में होता है। बैंक का क्रेडिट ऑडिट, बैंक का आंतरिक ऑडिट, कॉनकरंट ऑडिट, स्टॉक ऑडिट और एक्सटर्नल स्टेटुरी ऑडिट. लगातार छह वर्षों में कोई भी ऑडिट इस घोटाले को पकड़ने में चूक गया या फिर उन्होंने जान-बूझकर ऐसा किया?
एलओयू पर लोन देने वाले बैंकों की गलती
पिछले छह वर्षों से लगातार लेटर ऑफ अंडरटेकिंग के आधार पर कर्ज देने में गड़बड़ी में शामिल स्टेट बैंक, यूनियन बैंक, इलाहाबाद बैंक, एक्सिस बैंक ने इस तरह के दस्तावेजों का सत्यापन नहीं किया। हैरानी इसलिए भी है कि ये एलओयू एक ही समूह की कंपनियों के लिए था (फर्जी कंपनियों के लिए था) उसका सत्यापन या दोहरा चेकअप नहीं किया जबकि इनकी मियाद बढ़ाने की भी बात सामने आई है। ये एक भारी चूक प्रतीत होती है।
एलर्ट की अनदेखी
पिछले कुछ वर्षों से नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़ी कंपनियों में सन्देहास्पद लेनदेन का एलर्ट जारी होने के बाद भी मामले पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। एफआईयू की रिपोर्ट्स को नजरअंदाज किया गया, आयकर विभाग ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यहां भी एक भारी चूक हुई लगती है।