एशिया की तीसरी और विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाली मानसूनी बारिश इस बार जमकर बरसने की उम्मीद है। भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक केजे रमेश ने बुधवार को कहा कि यदि ऐन मौके पर अलनीनो ने नहीं चौंकाया तो इस बार पिछले साल के मुकाबले ज्यादा मानसूनी बारिश होने की संभावना है।
रमेश के दावे को इस लिहाज से अहम माना जा सकता है कि हाल ही में ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका की मौसम एजेंसियां प्रशांत महासागर में अलनीनो बनने की चेतावनी जारी कर चुकी हैं, लेकिन जून में भारत को भिगोने वाले दक्षिणी-पश्चिमी मानसून के बनने तक इस अलनीनो के कमजोर हो जाने की संभावना जताई जा रही है। बता दें कि मानसूनी बारिश सामान्य परिस्थितियों में 1 जून के आसपास केरल के रास्ते देश में प्रवेश करती हैं और इसके चार महीने बाद राजस्थान में पहुंचने तक पूरे देश को अपनी बूंदों से तर करती हैं।
हालांकि दो दिन पहले निजी मौसम एजेंसी स्काईमेट वेदर ने कमजोर मानसून की चेतावनी दी थी। स्काईमेट के मुताबिक, प्रशांत महासागर की स्थिति स्थायी नहीं है, जिसकी वजह से जून-जुलाई में कमजोर मानसून रहने का अनुमान है। मानसून पर अलनीनो का खतरा है, जिससे कम बारिश हो सकती है।
इसके बावजूद बुधवार को केजे रमेश ने कहा, फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस साल मानसून किस पैटर्न पर चलेगा, लेकिन हम जानते हैं कि व्यवहारिक तौर पर किसी ने भी मजबूत अलनीनो की भविष्यवाणी नहीं की है। उन्होंने संभावना जताई कि मौसम विभाग इस साल मानसून को लेकर अपनी पहली संभावना अप्रैल के मध्य तक जारी करेगा।
हर तरफ होता है प्रभाव
देश में 70 फीसदी बारिश मानसून के सीजन में ही होती है, जिसका कृषि उत्पादन पर बेहद प्रभाव पड़ता है। बेहतर मानसूनी बारिश के चलते कृषि उत्पादन बढ़ने पर अर्थव्यवस्था का हर हिस्सा प्रभावित होता है। फसलों के ज्यादा उत्पादन से खाद्य पदार्थों के दाम व ओवरऑल महंगाई नियंत्रण में रहती है। इससे भारतीय रिजर्व बैंक को भी ब्याज दरों में कटौती करनी पड़ती है। हालांकि फसलों के ज्यादा उत्पादन का किसानों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, जिन्हें फसलों का पर्याप्त दाम नहीं मिल पाता। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे मानसून से फसली उत्पादन बढ़ने के कारण करेंसी फ्लो बढ़ता है, जिसके चलते उद्योगों को भी ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा उपभोक्ता मिलते हैं और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।