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Avalanche: केवल 3 सेकंड में 'एवलांच' की सूचना देगा ये मॉनीटरिंग रडार, बर्फ में सेना व आम लोगों की राह हुई आसान

सार

जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमस्खलन बार बार होने वाली एक प्राकृतिक घटना/आपदा है। जिसने न सिर्फ आम लोग मारे जाते हैं बल्कि सुरक्षा बलों को भी अपनी जान गंवानी पड़ती है। इन आपदाओं को रोकने के लिए डीआरडीओं ने एक विशेष रडार बनाया है। जो तीन सेकेंड में खतरे की जानकारी दे देगा।
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हिमस्खलन - फोटो : X @ANI
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विस्तार
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पहाड़ों में आने वाले 'एवलांच' यानी हिमस्खलन की जानकारी समय रहते मिल जाए, इसके लिए कई तरह के तकनीकी उपकरण लगाए जा रहे हैं। डीआरडीओ के तहत रक्षा 'भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान' (डीजीआरई), डीजीआरई ने 72 स्नो मेटे ओरोलोजीकल ऑब्जर्वेटरी स्थापित की हैं। इसके अतिरिक्त, जिनमें से 45 स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्लूएस) प्रचालन में हैं। सौ एडब्लूएस परीक्षण के तहत हैं। इसके अलावा 203 एडब्लूएस स्थापना के अंतर्गत हैं। डीजीआरई में नियमित तौर पर स्नो मेट ऑब्जर्वेटरी से 3 घंटों के अंतराल पर और एडब्लूएस से एक घंटे के अंतराल पर डेटा प्राप्त होता है। इस जानकारी और विशेषज्ञ राय का उपयोग करके विभिन्न क्षेत्रों के लिए कम से कम 24 घंटे पहले हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। डीजीआरई द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, भारत में पहली बार, उत्तरी सिक्किम में हिमस्खलन मॉनीटरिंग रडार स्थापित किया गया है। इस प्रणाली से हिमस्खलनों का मात्र तीन सेकंड में पता लगाया जा सकता है। इसके चलते सेना और आम लोगों की राह आसान हो रही है। 

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हिमालयी क्षेत्रों में हिमस्खलन, जिनसे मानव जीवन और संपत्ति को भारी नुकसान होता है, के खतरों के प्रति केंद्र सरकार सजग है। जम्मू और कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमस्खलन बार बार होने वाली एक प्राकृतिक घटना/आपदा है। 

संकटग्रस्त क्षेत्रों में हिमस्खलनों की पूर्व चेतावनी और पूर्वानुमान में सुधार करने के लिए प्रभावकारी ढंग में प्रौद्योगिकियों का उपयोग करती है। हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान के लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) एक राष्ट्रीय स्तर की एजेंसी है। यह दैनिक रूप से रक्षा प्रयोक्ताओं के लिए ऑपरेशनल हिमस्खलन पूर्वानुमान संबंधी कार्यों में संलग्न है। डीआरडीओ के अंतर्गत रक्षा 'भू सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान' (डीजीआरई), चंडीगढ़ भी हिमस्खलन उपशमन संबंधी प्रौद्योगिकियों के अध्ययन और विकास के लिए एक नोडल एजेंसी है, जिसका आगे हिमस्खलन जोखिम संबंधी मानचित्र तैयार करने में एक सूचना के रूप में प्रयोग किया जाता है। 
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गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, उत्तर पश्चिम हिमालय के बर्फीले क्षेत्रों में सेना और आम लोगों को डीजीआरई द्वारा नियमित तौर पर ऑपरेशनल हिमस्खलन चेतावनी जारी की जाती है। इसके अतिरिक्त, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) स्थिति संबंधी जागरूकता बढ़ाने के लिए छह घंटे पर मौसम अपडेट जारी करता है। पूर्वानुमान संबंधी क्षमताओं में सुधार के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में स्वचालित मौसम स्टेशन और डॉप्लर रडार स्थापित किए गए हैं। डीजीआरई ने 72 स्नो मेटे ओरोलोजीकल ऑब्जर्वेटरी स्थापित की हैं। इसके अतिरिक्त, जिनमें से 45 स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्लूएस) प्रचालन में हैं। सौ एडब्लूएस परीक्षण के तहत हैं। इसके अलावा 203 एडब्लूएस स्थापना के अंतर्गत हैं। डीजीआरई में नियमित तौर पर स्नो मेट ऑब्जर्वेटरी से 3 घंटों के अंतराल पर और एडब्लूएस से एक घंटे के अंतराल पर डेटा प्राप्त होता है। 

इस जानकारी और विशेषज्ञ राय का उपयोग करके विभिन्न क्षेत्रों के लिए कम से कम 24 घंटे पहले हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। डीजीआरई ने हिमस्खलन संबंधी अपना स्वयं का मानचित्र भी तैयार किया है, जिसमें संपूर्ण हिमालय में स्थित संभावित हिमस्खलन स्थलों को दर्शाया गया है। इसका उपयोग सैन्य दलों द्वारा बर्फीले क्षेत्रों में उनकी सुरक्षित आवाजाही के लिए किया जा रहा है। प्रयोक्ताओं की आवश्यकताओं के अनुसार इंजीनियरिंग संबंधी समाधान भी प्रदान किए जा रहे हैं। 

डीजीआरई ने हिमालय के बर्फीले क्षेत्रों में जीवन की सुरक्षा के लिए हिमस्खलन संबंधी सटीक पूर्वानुमानों के लिए कई तरह की प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं। 

  • -एआई और एमएल (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग) आधारित हिमस्खलन पूर्वानुमान 
  • -स्वचालित मौसम स्टेशन नेटवर्क का विस्तार करना और बर्फीले क्षेत्रों के लिए सतही ऑब्जर्वेटरी 
  • -हिमस्खलन इंजीनियरिंग नियंत्रण संरचना 
  • -हिमस्खलन पूर्व चेतावनी रडार 
  • -हिमस्खलन संबंधी चेतावनी के प्रचार प्रसार के लिए ऑनलाइन एप आधारित कॉमन अलर्ट प्रोटोकॉल 
  • -लास्ट माइल के लिए सैटेलाइट आधारित संचार का उपयोग करते हुए पूर्वानुमान का प्रचार प्रसार 
  • -मल्टी स्केल मैटेरियल प्रोपर्टीज सिमुलेशन 
  • -प्रक्रिया आधारित 3डी ढलानों की स्थिरता के लिए स्नोपैक मॉडलिंग 
  • -हिमस्खलन से रक्षा के लिए हल्के भार वाली सुद्दढ़ संरचना 
  • -इनसार आधारित भूस्खलन चेतावनी प्रौद्योगिकी 

डीजीआरई द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, भारत में पहली बार, उत्तरी सिक्किम में हिमस्खलन मॉनीटरिंग रडार स्थापित किया गया है। इस प्रणाली से हिमस्खलनों का मात्र तीन सेकंड में पता लगाया जा सकता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के अंतर्गत राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएमआरडब्लूएफ) अपनी वैश्विक, क्षेत्रीय और सामूहिक अनुमान प्रणालियों के माध्यम से डीजीआरई को दैनिक आधार पर हाई रेजोल्यूशन वाले मौसम पूर्वानुमान प्रदान करता है। डीजीआरई अपना पर्वतीय मौसम संबंधी मॉडल और हिमस्खलन पूर्वानुमान मॉडल संचालित करने के लिए 
एनसीएमआरडब्लूएफ मॉडल की सूचना का उपयोग करता है। इसके अतिरिक्त, सर्दी के मौसम में, एनसीएमआरडब्लूएफ कपल्ड मॉडल के हिमपात संबंधी पूर्वानुमानों को डीजीआरई के साथ साझा करता है। डीजीआरई की ओर से संभावित हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान के लिए हिमपात और कुल वर्षा संबंधी ये पूर्वानुमान बहुत उपयोगी होते हैं। 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने अपनी कार्रवाई, तैयारी और उपशमन संबंधी रणनीतियों के संबंध में राज्यों को परामर्श देने के लिए जून 2009 में भूस्खलन एवं हिमस्खलन के प्रबंधन पर दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन दिशानिर्देशों में हिमस्खलनों के प्रभाव को कम करने और पूर्व चेतावनी से संबंधित उपाय शामिल हैं। विभिन्न प्रचार माध्यमों, जैसे एसएमएस, कॉस्टल सायरन, सेल ब्राडकास्ट, इंटरनेट (आरएसएस फीड और ब्राउजर अधिसूचना), गगन और नाविक के सेटेलाइट रिसीवर आदि इस्तेमाल करके, सभी चेतावनी एजेंसियों भारत मौसम विज्ञान विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, रक्षा भू सूचना अनुसंधान प्रतिष्ठान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और भारतीय वन सर्वेक्षण के एकीकरण के माध्यम से सभी 36 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में भारत के नागरिकों को आपदाओं से संबंधित भू लक्षित पूर्व चेतावनियों/अलर्टों के प्रसार के लिए 454.65 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ, कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल आधारित एकीकृत अलर्ट प्रणाली की शुरुआत की गई है। 

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