पहाड़ों में आने वाले 'एवलांच' यानी हिमस्खलन की जानकारी समय रहते मिल जाए, इसके लिए कई तरह के तकनीकी उपकरण लगाए जा रहे हैं। डीआरडीओ के तहत रक्षा 'भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान' (डीजीआरई), डीजीआरई ने 72 स्नो मेटे ओरोलोजीकल ऑब्जर्वेटरी स्थापित की हैं। इसके अतिरिक्त, जिनमें से 45 स्वचालित मौसम स्टेशन (एडब्लूएस) प्रचालन में हैं। सौ एडब्लूएस परीक्षण के तहत हैं। इसके अलावा 203 एडब्लूएस स्थापना के अंतर्गत हैं। डीजीआरई में नियमित तौर पर स्नो मेट ऑब्जर्वेटरी से 3 घंटों के अंतराल पर और एडब्लूएस से एक घंटे के अंतराल पर डेटा प्राप्त होता है। इस जानकारी और विशेषज्ञ राय का उपयोग करके विभिन्न क्षेत्रों के लिए कम से कम 24 घंटे पहले हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान लगाए जाते हैं। डीजीआरई द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, भारत में पहली बार, उत्तरी सिक्किम में हिमस्खलन मॉनीटरिंग रडार स्थापित किया गया है। इस प्रणाली से हिमस्खलनों का मात्र तीन सेकंड में पता लगाया जा सकता है। इसके चलते सेना और आम लोगों की राह आसान हो रही है।
डीजीआरई द्वारा दी गई सूचना के अनुसार, भारत में पहली बार, उत्तरी सिक्किम में हिमस्खलन मॉनीटरिंग रडार स्थापित किया गया है। इस प्रणाली से हिमस्खलनों का मात्र तीन सेकंड में पता लगाया जा सकता है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (एमओईएस) के अंतर्गत राष्ट्रीय मध्यम अवधि मौसम पूर्वानुमान केंद्र (एनसीएमआरडब्लूएफ) अपनी वैश्विक, क्षेत्रीय और सामूहिक अनुमान प्रणालियों के माध्यम से डीजीआरई को दैनिक आधार पर हाई रेजोल्यूशन वाले मौसम पूर्वानुमान प्रदान करता है। डीजीआरई अपना पर्वतीय मौसम संबंधी मॉडल और हिमस्खलन पूर्वानुमान मॉडल संचालित करने के लिए
एनसीएमआरडब्लूएफ मॉडल की सूचना का उपयोग करता है। इसके अतिरिक्त, सर्दी के मौसम में, एनसीएमआरडब्लूएफ कपल्ड मॉडल के हिमपात संबंधी पूर्वानुमानों को डीजीआरई के साथ साझा करता है। डीजीआरई की ओर से संभावित हिमस्खलन संबंधी पूर्वानुमान के लिए हिमपात और कुल वर्षा संबंधी ये पूर्वानुमान बहुत उपयोगी होते हैं।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने अपनी कार्रवाई, तैयारी और उपशमन संबंधी रणनीतियों के संबंध में राज्यों को परामर्श देने के लिए जून 2009 में भूस्खलन एवं हिमस्खलन के प्रबंधन पर दिशानिर्देश जारी किए हैं। इन दिशानिर्देशों में हिमस्खलनों के प्रभाव को कम करने और पूर्व चेतावनी से संबंधित उपाय शामिल हैं। विभिन्न प्रचार माध्यमों, जैसे एसएमएस, कॉस्टल सायरन, सेल ब्राडकास्ट, इंटरनेट (आरएसएस फीड और ब्राउजर अधिसूचना), गगन और नाविक के सेटेलाइट रिसीवर आदि इस्तेमाल करके, सभी चेतावनी एजेंसियों भारत मौसम विज्ञान विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र, रक्षा भू सूचना अनुसंधान प्रतिष्ठान, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और भारतीय वन सर्वेक्षण के एकीकरण के माध्यम से सभी 36 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में भारत के नागरिकों को आपदाओं से संबंधित भू लक्षित पूर्व चेतावनियों/अलर्टों के प्रसार के लिए 454.65 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ, कॉमन अलर्टिंग प्रोटोकॉल आधारित एकीकृत अलर्ट प्रणाली की शुरुआत की गई है।