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घाटी में 1990 जैसे हालात, जनता के बीच जाने वाला कोई बड़ा नेता नहीं

Mon, 05 Sep 2016 04:27 AM IST
गुंजन कुमार/नई दिल्ली
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- फोटो : PTI
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जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल के समानांतर चल रही बैक चैनल बातचीत की कोशिशें काम नहीं आई। अलगाववादी हुर्रियत नेताओं ने प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत से इनकार कर राज्य और केंद्र सरकार के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है।
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पिछले दो महीने में पीडीपी और मुख्यमंत्री  महबूबा मुफ्ती के प्रतिबढ़ती नाराजगी के माहौल में केंद्र के सामने अलगाववादी नेता ही ऐसे विकल्प थे जो क्रुद्ध जनता के बीच जाकर उन्हें समझा सकते थे। पर्दे के पीछे काम कर रहे कश्मीर के रणनीतिकारों के मुताबिक घाटी में फिलहाल ऐसा कोई चेहरा नहीं रह गया है जो आम जनता के बीच जाकर बातचीत कर सके।

खुफिया विभाग के उच्चपदस्थ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि 1990 में भी ऐसे हालात पैदा हुए थे जब पूरा आंदोलन नेता रहित हो गया था। आज भी वही हालात बन गए हैं। सूत्रों ने मुताबिक राजनीतिक समाधान की बातचीत आवाम को विश्वास  में लिए बिना नहीं हो सकता।
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नेशनल कांफ्रेंस की जमीनी पकड़ कमजोर

- फोटो : PTI
रविवार को सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को मिली ठंडी प्रतिक्रया के बाद साफ हो गया कि जनता के बीच जा कर बात करने वाला फिलहाल कोई बड़ा चेहरा नहीं है। कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस (एनसी) की जमीनी पकड़ पहले ही कमजोर पड़ चुकी है। पीडीपी की हालात यह है कि दूर दराज  के गांवों में भी उनके विधायकों पर हमले हो रहे हैं। भाजपा के घाटी में वैसे भी कोई आधार नहीं। ऐसे में बैक चैनल बातचीत के जरिए अलगावादियों को विश्वास में लेने की कोशिश की जा रही थी।

सूत्रों के मुताबिक यही वजह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद  महबूबा मुफ्ती ने अलगाववादियों और पाकिस्तान से बातचीत की जरुरत पर जोर दिया था। लेकिन राज्य और केंद्र सरकार ने जरुरी कदम उठाने  में  देर कर दी।

सूत्रों ने बताया कि संसद में कश्मीर पर चर्चा और मोदी के साथ सर्वदलीय  बैठक के बाद ही प्रतिनिमंडल का जाना और बैक चैनल बातचीत की शुरुआत करना कारगर कदम होता। अधिकारी के मुताबिक महबूबा ने  अंतिम वक्त  में बतौर पीडीपी अध्यक्ष अलगाववादियों को बातचीत  का न्यौता  दे कर राजनीतिक जोखिम उठाया है। महबूबा ने यह कदम उठाया जब बैक चैनल बातचीत  का कोइ नतीजा नहीं निकल रहा था।
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