मराठवाड़ा इलाके में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार संजीव उनहाले कहते हैं, "कर्ज माफी के संबंध में जो आंकड़े दिए गए हैं को बढ़ा-चढ़ा कर बताए गए हैं। जिला स्तर पर बैंक खस्ताहाल हैं और इस कारण कर्ज माफी का काम अधूरा रह गया है। इस तरह की स्थिति में बैंकों को जितने किसानों को लोन देना चाहिए उसका दस फीसद भी अभी नहीं हो पाया है।"
"कर्ज माफी की प्रक्रिया इंटरनेट के जरिए हो रही है लेकिन डिजिटल साक्षरता किसानों को दी ही नहीं गई है, तो वो इसका लाभ कैसे ले पाएंगे? क्या उन्होंने इसके संबंध में आंकड़ों की पड़ताल की है?"
संजीव उनहाले कहते हैं, "उन्हें इस कार्यक्रम को लागू करने से पहले इसका पायलट प्रोजेक्ट करना था लेकिन ऐसा किया नहीं गया। किसानों ने पंजीकरण केंद्र के लिए लगाए गए शिविरों में जाकर ये पता लगाया कि उनका नाम लाभार्थियों की सूची में शामिल किया गया है या नहीं। ये लोग इंटरनेट नहीं समझते। किसानों के साथ क्रूर मजाक किया गया है।"
वरिष्ठ पत्रकार निशिकांत भालेराव उचित समर्थन मूल्य से जुड़ी समस्या के बारे में विस्तार से समझाते हैं। वो कहते हैं, "किसानों की समस्या का समाधान करने के लिए उन्हें उचित समर्थन मूल्य दिया जाना चाहिए। सिर्फ न्यूनतम समर्थन मूल्य दे देना काफी नहीं। उन्हें मदद चाहिए, उनकी स्थिति दिन प्रतिदिन बिगड़ रही है। प्रकृति की नाराजगी के साथ-साथ राज्य सरकार के फैसलों ने किसानों की समस्या को केवल बढ़ाया ही है।"
किसानों की मांग है कि उन्हें स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशों के अनुसार C2+50% यानी कॉस्ट ऑफ कल्टिवेशन (यानी खेती में होने वाले खर्चे) के साथ-साथ उसका पचास फीसदी और दाम समर्थन मूल्य के तौर पर मिलना चाहिए। किसान नेता मानते हैं कि ऐसा करने पर किसानों की आय की स्थिति को सुधारा जा सकता है।
संजीव उनहाले कहते हैं, "सरकार और किसान दोनों का ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर कोई नियंत्रण नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों की गिरावट का सीधा असर किसानों पर पड़ता है जिससे वो बुरी तरह प्रभावित होते हैं। अगर सरकार कृषि से जुड़ी चीजों के प्रोसेसिंग यूनिट लगाती है तो किसानों को बेहतर दाम मिल सकते हैं। सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए।"
राज्य के आर्थिक सर्वे की बात करें तो बीते सालों में कृषि विकास दर कम हुई है। किसान नेता विजय जावंधिया कहते हैं, "संविधान के अनुसार कृषि राज्य का विषय है। लेकिन इस दिशा में जो भी महत्वपूर्ण फैसले होते हैं वो केंद्र सरकार करती है। न्यूनतम समर्थन मूल्य से लेकर आयात-निर्यात के फैसले केंद्र सरकार के होते हैं।"
वो कहते हैं, "इसका असर अब दिखने लगा है। खेती से होने वाली आय 44 फीसदी तक कम हो गई है। कपास, अनाज और दलहन से होने वाली आय दिन प्रतिदिन कम हो रही है। और इस कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था से पैसा लगातार बाहर जा रहा है।"
Farmers Protest in Maharashtra
निशिकांत भालेराव कहते हैं, "कपास की खेती पर कीड़ों ने कहर बरपाया हुआ है। इसकी खेती को कीड़े प्रभावित करते रहेंगे। इसीलिए नए और उन्नत किस्म के कपास के बीजों की जरूरत है। इस वक्त यही इस समस्या का समाधान दिखता है। हमने पहले भी सूखा और बीमारी से बचने वाली कपास की किस्मों के विकास पर अधिक ध्यान नहीं दिया है।"
वो कहते हैं, "औरंगाबाद स्थित माहिको कंपनी इस विषय पर शोध करने के लिए हर साल 150 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। लेकिन कुछ लोग, खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कुछ लोग उन्नत किस्म के बीजों के लिए तैयार नहीं हैं। खाद्य उत्पाद तो नहीं, लेकिन कृषि उत्पादों की प्रोसेसिंग केमिकल्स के ज़रिए की जा सकती है।"
"माहिको के पास उन्नत किस्म के बीज हैं। लेकिन केंद्रीय सरकार इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। ऐसे बीज इस्तेमाल करने से कीड़ों की समस्या से निजात मिल सकती है।"
इस मार्च में हजारों की संख्या में आदिवासी हिस्सा ले रहे हैं। वास्तव में, मार्च में सबसे अधिक संख्या में आदिवासी ही शामिल हैं। मीना निखिल कहते हैं, "नाशिक क्षेत्र में जनजातीय भूमि वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। यहां किसान आदिवासी हैं और वो खेती करते हैं लेकिन उनके पास इन जमीनों का मालिकाना हक नहीं है। इसीलिए आदिवासी अपनी उस जमीन पर अपना हक मांग रहे हैं जिसकी वो पूजा करते हैं।"
कई आदिवासियों ने बीबीसी के साथ अपनी समस्याएं साझा कीं। उन्होंने बताया, "कई बार वन अधिकारी हमारे खेत खोद देते हैं। वो जब चाहें तब ऐसा कर सकते हैं। हमें अपनी जमीन पर अपना हक चहिए। हमें हमेशा दूसरे की दया पर जीना पड़ता है।"
आदिवासी किसान अपने लिए कर्ज माफी , उचित समर्थन मूल्य और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की मांग कर रहे हैं।
विजय जावंधिया राज्य पर ऋणभार की स्थिति के बारे में विस्तार से बताते हैं। वो कहते हैं, "जब कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार थी तक राज्य पर ढाई लाख करोड़ रुपये के ऋणभार था। ये ऋणभार अब बढ़कर 4 लाख 13 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।"
वो पूछते हैं, "ये पैसा आखिर किसने खर्च किया? इससे आम आदमी को क्या लाभ मिला? किसानों को इससे क्या मिला है? वक्त के साथ ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच की खाई बढ़ती गई है। इस कारण किसानों के इर्द-गिर्द घूमने वाली ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है।"
लाल्या-खुर्कट जैसी बिमारियों ने पशुओं पर काफी हद तक प्रभावित किया है। कुछ किसानों के पशुओं की मौत हो गई है। पत्रकार भालेराव कहते हैं, "ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक पशु देखभाल केंद्र मौजूद हैं, लेकिन उनकी स्थिति दयनीय है। ये केंद्र पशुओं समय पर जानवरों का उपचार नहीं करते।"