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इसलिए प्रसिद्ध है दिल्ली का रामलीला मैदान, ये है इसकी राजनीति में ऐतिहासिक उपलब्धियां

Sat, 25 Aug 2018 01:00 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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रामलीला मैदान की चर्चा इन दिनों अटल बिहारी वाजपेयी का नाम जोड़े जाने से की जा रही है। भाजपा अपने दिवंगत नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सम्मान देने के लिए अब ये जोर लगा रही है लेकिन रामलीला मैदान का नाम बदलने के प्रस्ताव पर विवाद शुरू हो गया है। इसी बीच जानना ये भी जरूरी हो गया है कि आखिर रामलीला मैदान का देश में क्या महत्व है?  

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रामलीला मैदान हर साल उस समय चर्चा में आता है जब दशहरे के मौके पर रामलीला का मंचन होता है और उसके बाद रावणदहन होता है। अजमेरी गेट और तुर्कमान गेट के बीच 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस रामलीला मैदान में एक लाख लोग खड़े हो सकते हैं पर पुलिस के मुताबिक यहां सिर्फ 25 से 30 हजार लोगों की क्षमता है। कहा जाता है कि इस मैदान को अंग्रेजों ने 1883 में ब्रिटिश सैनिकों के शिविर के लिए तैयार करवाया था। समय के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के कई संगठनों ने इस मैदान में रामलीलाओं का आयोजन करना शुरु कर दिया, जिसके चलते इसकी पहचान रामलीला मैदान के रूप में हो गई।
 

इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान से युद्ध की जीत का जश्न इसी मैदान पर मनाया था। ये रामलीला मैदान देश के इतिहास के बदलने का गवाह रहा है।

आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और दूसरे नेताओं के लिए विरोध जताने का ये सबसे पसंदीदा मैदान बन गया था।

इसी मैदान पर मोहम्मद अली जिन्ना से जवाहर लाल नेहरू तक और बाबा राम देव से लेकर अन्ना हजारे तक सारे लोग इसी मैदान से क्रांति की शुरुआत करते रहे हैं।

कहा तो ये भी जाता है कि यही वो मैदान है जहां 1945 में हुई एक रैली में भीड़ ने जिन्ना को मौलाना की उपाधि दे दी थी। लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने मौलाना की इस उपाधि पर भीड़ से नाराजगी जताई और कहा कि वो राजनीतिक नेता है न कि धार्मिक मौलाना।

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इस मैदान का इस्तेमाल सरकारी रैलियों और सत्ता के खिलाफ आवाज बुलंद करने जैसी दोनों ही परिस्थितियों में किया गया।

दिसंबर 1952 में रामलीला मैदान में जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सत्याग्रह किया था। इससे सरकार हिल गई थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1956 और 57 में मैदान में विशाल जनसभाए की।

जयप्रकाश नारायण ने इसी मैदान से कांग्रेस सरकार के खिलाफ हुंकार भरी थी।

ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर की प्रसिद्ध पंक्तिंया 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है नारा' यहीं गूंजा था। 

28 जनवरी, 1961 को ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ ने रामलीला मैदान में ही एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था।

26 जनवरी, 1963 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की उपस्थिति में लता मंगेश्कर ने एक कार्यक्रम पेश किया।

1965 में पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने इसी मैदान पर एक विशाल जनसभा में जय जवान, जय किसान का नारा एक बार फिर दोहराया था।

1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के निर्माण और पाकिस्तान से युद्ध जीतने का जश्न मनाने के लिए इसी मैदान में एक बड़ी रैली की थी और जहां उन्हें जनता का भारी समर्थन मिला था।

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