फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'इतनी भी बुरी हालत नहीं है भारतीय सेना की'

Sun, 23 Jul 2017 02:43 PM IST
बीबीसी हिन्दी
विज्ञापन
indian army
विज्ञापन
हिंदी अख़बार दैनिक भास्कर की एक ख़बर के अनुसार, संसद में पेश हुई नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर युद्ध छिड़ जाए तो भारतीय सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने गोला-बारूद में से 40 फ़ीसदी तो 10 दिन में ही ख़त्म हो जाएगा।
विज्ञापन



कैग की रिपोर्ट में भारतीय सेना को मिलने वाले असलहे की उपलब्धता और सप्लाई को लेकर कई पहलू सामने आए हैं। भारतीय मीडिया में आ रही रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय सेना इन दिनों गोला बारूद की भारी कमी से जूझ रही है।


ऑर्डिनेंस फ़ैक्ट्री बोर्ड को लेकर इस तरह की रिपोर्ट पहले भी आई थी और जब भारत और चीन के बीच तनाव बना हुआ है ऐसे में इस तरह की रिपोर्ट दोबारा आई है। लेकिन इस रिपोर्ट का आधार भारतीय सेना को असलहे की ज़रूरत है। इसे लेकर क़रीब 40 साल पहले वॉर वेस्टेज रिज़र्व के हिसाब से एक टेबल बनाया गया था। उस ज़माने में जब लड़ाइयां होती थीं तो महीने भर या डेढ़ महीने तक जंग जारी रहने का अंदाजा रहता था।
विज्ञापन



और माना जाता था कि नतीजा न निकलने पर दुनिया के देश लड़ रहे पक्षों पर युद्ध विराम घोषित करने का दबाव बनाएंगे। लेकिन मौजूदा हालात एकदम अलग हैं। आज अगर युद्ध होता है तो सात से दस दिन में ही दुनिया भर के देश युद्धविराम करने को कहने लगेंगे।


चूंकि पाकिस्तान और चीन के साथ भारत की लड़ाई की संभावना बन सकती है, दुनिया के ताकतवर देश इसे लेकर काफ़ी चिंतित होंगे और इस तरह की जंग को बंद करने की कोशिश करेंगे। भारत, पाकिस्तान और चीन के पास परमाणु हथियार हैं, इसलिए लड़ाई शुरू होने की स्थिति में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल से चिंतित दुनिया ज़्यादा दिन तक संघर्ष चलने नहीं देगी।


कैग की वेबसाइट पर मौजूद आर्मी एंड ऑर्डिनेंस फ़ैक्ट्रीज़ रिपोर्टस में कहा गया है कि पहले हुए ऑडिट के बाद मार्च 2013 से लेकर अब तक ऑर्डनेंस फ़ैक्ट्री बोर्ड की तरफ़ से असलहे की सप्लाई की गुणवत्ता और असलहे की भारी कमी की स्थिति में कोई ख़ास सुधार नहीं आया है।
Trending Videos

indian army
इसमें ये भी कहा गया है कि 2009-2013 के दौरान सेना के मुख्यालय की तरफ़ से ओएफ़बी के अलावा भी जो ख़रीद और प्रबंध किए जाने थे वो जनवरी 2017 तक पेंडिंग हैं। इसमें मीडिया के अलावा मौजूदा और रिटायर हो चुके सेनाधिकारियों ने सवाल उठाए हैं कि रक्षा मंत्रालय की छत्रछाया में चलने वाली इन कंपनियों का प्रदर्शन उस दर्ज़े का नहीं है। जो भारत के लिए चाहिए और जिसकी उम्मीद की जाती है।


इसलिए ये ज़रूरी है कि इनसे अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद करनी चाहिए। लेकिन मैं यहां ये भी कहना चाहूंगा कि जहां-जहां भारत पर ख़रीदने की रोक है जैसे मिसाइल तकनीक और परमाणु तकनीक, ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। क्योंकि दुनिया के देश ये तकनीकें भारत को बेचने को तैयार नहीं है। ख़ासकर ब्रिटेन, अमरीका, रूस और फ्रांस जैसे देश चाहते हैं कि भारत उनसे हथियार ख़रीदता रहे क्योंकि भारत हथियारों का सबसे बड़ा ख़रीदार है।


भारतीय तंत्र में सरकारें, वैज्ञानिक और सेनाधिकारी हथियार ख़रीदने में ख़ुश हैं। इसलिए रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों पर दबाव नहीं बनाते या उन्हें इतना फंड नहीं दिया जाता कि वो शोध करके बेहतरीन तकनीकें विकसित कर सकें। इन कंपनियों को जितना भी फंड मिलता है उसी में वे कई तरह के काम करने की कोशिश कर रही हैं।


इसका एक उदाहरण है लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट। भारत ने जितने पैसे में इसे बनाकर दुनिया को दिखाया, उतने ख़र्च में दुनिया के अन्य देशों में इसका ढांचा भी नहीं बन पाता। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2008 से 17 के बीच सेना की मांग और हथियारों की पूर्ति में भारी अंतर रहा है।
विज्ञापन

indian army

जब पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा और चीन के साथ सिक्किम के पास सीमा पर तनाव लगातार बना हुआ है और चीन भारत को धमकी देता रहता है, ऐसे में असलहे की कमी सेना के लिए चिंता की बात है। दरअसल हक़ीक़त तो ये है कि अभी भारतीय सेना के पास सुरक्षा के लिए साधन हैं ही नहीं। सेना को कई तरह के हथियार चाहिए, लेकिन सेना लंबे समय की योजना बनाती है जिसे लॉन्ग टर्म इंटिग्रेटेड पर्स्पेक्टिव प्लानिंग कहते हैं।

इसके तहत सेना की तीनों शाखाएं आने वाले पांच,दस साल, पंद्रह या बीस साल में अपनी ज़रूरतों का नक्शा तैयार करती हैं, अगर सेना ये योजना न बनाए तो समय आने पर वो सामान तैयार नहीं मिलेगा।


युद्ध में तीन-चार किस्म के असलहे ज़्यादा इस्तेमाल में आते हैं, लेकिन अगर लड़ाई छिड़ भी जाती है तो दस दिन के बाद वॉर वेस्टेज रिज़र्व की ज़रूरत होगी। इस लिहाज से भारतीय सेना की हालत उतनी भी कमज़ोर नहीं है जितनी बताई जा रही है। सीएजी की इस रिपोर्ट से पहले 1998 में करगिल की लड़ाई के बाद बनी समीक्षा कमेटी की कई सिफ़ारिशें थीं।

यूपीए सरकार के दौरान नरेश चंद्रा कमेटी ने सिफ़ारिश की थी कि चीफ़ ऑफ़ इंडिग्रेटेड डिफ़ेंस स्टाफ़ और इंटर सर्विसेज़ थिएटर कमांड होना चाहिए। अब तक ऐसा कुछ नहीं हो पाया है। वहीं चीन के पास वेस्टर्न थिएटर कमांड है जिसका एक अधिकारी अक्साई चीन से लेकर म्यांमार की सीमा तक सेना की सारी टुकड़ियों का कमांडर है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें