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Hong Kong: अमेरिकी बॉन्ड्स में भारी निवेश करने वाले एशियाई देशों की बढ़ रही चिंता, डॉलर की मजबूती टिकाऊ नहीं

Sun, 09 Oct 2022 02:51 PM IST
वीरेंद्र शर्मा वर्ल्ड न्यूज, अमर उजाला, हांगकांग

सार

अमेरिका में महंगाई दर 40 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। इसे देखते हुए वहां का सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व लगातार ब्याज दर बढ़ा रहा है। इस वजह से डॉलर की कीमत बाकी तमाम मुद्राओं की तुलना में तेजी से बढ़ी है।
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अमेरिकी अर्थव्यवस्था - फोटो : pixabay
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विस्तार
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अमेरिका सरकार पर मौजूद कर्ज के 31 ट्रिलियन डॉलर पहुंच जाने से एशिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में खास चिंता है। खास कर जापान और चीन में चिंता गहरा गई है। जापान और चीन दो ऐसे देश हैं, जिनके पास अमेरिका सरकार के सबसे ज्यादा बॉन्ड हैं। जापान ने 1.23 ट्रिलियन और चीन ने लगभग एक ट्रिलियन डॉलर का निवेश अमेरिकी बॉन्ड्स में कर रखा है। कुल मिलाकर एशिया का अमेरिकी बॉन्ड्स में 3.5 ट्रिलियन डॉलर का निवेश है। अमेरिका पर कर्ज के रिकॉर्ड सीमा तक चढ़ जाने को वहां बॉन्ड्स में अपना पैसा लगा चुके निवेशकों के लिए एक बुरी खबर माना जा रहा है।
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अमेरिका में महंगाई दर 40 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है। इसे देखते हुए वहां का सेंट्रल बैंक- फेडरल रिजर्व लगातार ब्याज दर बढ़ा रहा है। इस वजह से डॉलर की कीमत बाकी तमाम मुद्राओं की तुलना में तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक डॉलर की ये मजबूती टिकाऊ नहीं है। अमेरिकी थिंक टैंक मैनहटन इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलॉ ब्रायन रीडल ने तो यहां तक कह दिया है कि डॉलर की ‘पार्टी खत्म हो चुकी है’। रीडल ने निवेशकों को संबोधित करते हुए कहा कि अब कोई ऐसा निवेश स्थल नहीं है, जिसे सुरक्षित कहा जाए।

विश्लेषकों के मुताबिक अभी डॉलर को इस बात का फायदा मिला है कि सुरक्षित निवेश के दूसरे विकल्पों का अभाव है। यूरोप में आर्थिक वृद्धि दर में भारी गिरावट के कारण यूरो जोन की मुद्रा यूरो का मूल्य 20 साल के सबसे निचले स्तर पर है। ब्रिटिश पाउंड और जापान की मुद्रा येन की कीमत भी हाल में मुंह के बल गिरी है। चीन की मुद्रा युवान भी कमजोर हुई है। वैसे भी युवान में अभी इतनी नकदी मौजूद भी नहीं है, जिससे उसे डॉलर का विकल्प समझा जा सके। कुछ विश्लेषकों ने कहा है कि इन हालात के बीच क्रिप्टोकरेंसी एक स्थिर विकल्प हो सकता है। लेकिन आज भी ज्यादातर लोग इसे विश्वसनीय मुद्रा नहीं मानते।
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डॉलर की कीमत इस वर्ष औसतन 17 प्रतिशत बढ़ी है। शुक्रवार को इस बारे में अपनी एक रिपोर्ट में एसएंडपी ग्लोबल क्रेडिट रेटिंग ने कहा कि दुनिया भर में नीति निर्माताओं के सामने यह साफ नहीं है कि डॉलर की बढ़ती कीमत पर कैसे लगाम लगाई जाए। जबकि डॉलर की ऊंची दर से अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी समस्या खड़ी हुई है।

एसएंडपी के वैश्विक मुख्य अर्थशास्त्री पॉल ग्रुएनवाल्ड ने कहा है- ‘ऐसा लगता है कि हम बीते 50 साल में डॉलर की तीसरी सबसे ऊंची दर के दौर में हैँ। लेकिन इस मसले का कोई आसान हल नहीं है। अगर ब्याज दर ना बढ़ाई जाए तो मुद्रास्फीति और मुद्रा की साख का खतरा है। ब्याज दर बढ़ने पर उत्पादन और रोजगार में गिरावट का अंदेशा है।’

इसी बीच अमेरिका पर कर्ज का बोझ रिकॉर्ड सीमा तक पहुंचने की खबर आई है। इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के दूरगामी भविष्य लेकर चिंता और गहरा गई है। विश्लेषकों के मुताबिक ऐसे में उन देशों का फिक्रमंद होना लाजिमी है, जिन्होंने अपना धन वहां लगा रखा है। अगर अमेरिकी बॉन्ड बाजार में ब्रिटेन जैसा संकट खड़ा हुआ, तो ऐसे देशों को भारी नुकसान होगा। इसी आशंका के कारण चीन इस वर्ष अमेरिकी बॉन्ड में अपना निवेश घटाने की नीति पर आगे बढ़ा है। अब संकेत हैं कि जापान भी ये नीति अपना सकता है।
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