राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संविधान के अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधानों को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिया है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर को प्राप्त अब तक का विशेष दर्जा खत्म हो गया और इसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। इसका एक हिस्सा लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक सरकार के इस प्रयास के बाद असली चुनौती अब सामने आने वाली है। यह चुनौती जम्मू-कश्मीर में देश के कानून को लागू करने की होगी। अलगाववादियों और विपक्षी दलों के अलावा सामान्य लोगों का सहयोग प्राप्त किये बिना यह मुश्किल भरा काम होगा।
कश्मीर से विस्थापित होने का दंश झेल रहे कश्मीरी पंडित सुशील ने कहा कि अनुच्छेद 370 के विवादित प्रावधान हटाने से समस्या की पहली सीढ़ी पार हुई है। अब असली चुनौती स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने की होगी। नागरिकों के सहयोग के बिना कोई भी देश या कानून सफल नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में कानून का शासन लागू करने के पहले जिहाद की जो मानसिकता कश्मीर के कुछ युवाओं और पाकिस्तान के जरिये फैलाई जा रही है, उसे रोकने की जरूरत है।
'रूट्स इन कश्मीर' संस्था के प्रमुख सुशील पंडित ने कहा कि कश्मीर में शांति लाने और कानून का शासन स्थापित करने में पाकिस्तान भी एक बड़ी बाधा है। दोनों देशों के बीच अच्छे विश्वास वाले रिश्ते बनाए बिना यह नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि खुद पाकिस्तान के अंदर की राजनीति उसे कश्मीर कार्ड खेलने को प्रेरित करती है। वहां की स्थिति में मजबूती आये बिना कश्मीर के प्लान को पूरा सफल नहीं कहा जा सकता। लेकिन इस संदर्भ में भारत की भूमिका सीमित है।