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सिनेमा कलाकार बनने की चाहत से मजबूत हो रहे थियेटर, सोशल मीडिया के दौर में भी दर्शकों की कमी नहीं

Tue, 13 Nov 2018 06:34 PM IST
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : Amar Ujala
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नाटकों के मंचन के जरिये लंबे समय से समाज की समस्याएं लोगों के सामने रखी जाती रही हैं। लेकिन सिनेमा और मोबाइल ने तेजी से नाटकों के आधार यानी दर्शकों को उससे दूर किया है। बावजूद इसके इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों का कहना है कि नाटक अब भी समाज की परेशानियों को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है जिसमें लोगों को अपनी ओर खींचने की क्षमता है। इसके साथ ही थियेटर से निकले कई कलाकारों ने सिनेमा जग में बड़ा मुकाम हासिल किया है। यही कारण है कि फिल्मी दुनिया में काम करने के इच्छुक युवाओं के लिए थियेटर ट्रेनिंग स्कूल का काम कर रहा है और इसी आधार के सहारे अपने संकट की घड़ी में भी थियेटर लगातार मजबूत हो रहा है। 

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दिल्ली में स्थित नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के जनसंपर्क अधिकारी एके बरुआ के मुताबिक सामान्य तौर पर ऐसा लगता है कि ड्रामा अब बीते जमाने की बात हो चुका है, लेकिन इस मामले का एक पहलू यह भी है कि दिल्ली के प्रमुख रंगमंचों पर खेले जाने वाले नाटक को देखने के लिए लोग एक हजार से तीन हजार रुपये का टिकट भी खरीद रहे हैं।

इससे साफ जाहिर है कि इसे पसंद करने वाला वर्ग भी है। इसके अलावा नुक्कड़ नाटकों के जरिये विभिन्न राजनीतिक दल और संगठन अपनी बात लोगों तक पहुंचाने की  कोशिश करते हैं। इससे भी लगता है कि यह कला उतनी संकट में नहीं है जितनी कि लोग समझ रहे हैं। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि इसके सामने चुनौतियां जरुर हैं जिसका सामना किये जाने की जरूरत है।   

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- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, राष्ट्रीय नाट्यकला संस्थान (एनएसडी) में अब पहले की तुलना में ज्यादा संख्या में युवा थिएटर यानी नाटक कला सीखने के लिए आ रहे हैं। अभिभावक बच्चों को थिएटर सिखाने के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं, और पूरा जतन कर रहे हैं। इसके पीछे का कारण यह है कि यहां से निकले छात्रों ने अभिनय की दुनिया में बड़ा नाम कमाया है।

सिनेमा उद्य़ोग में काम कर रहे कई नामी कलाकार जैसे ओम पुरी, राजबब्बर, अनुपम खेर, राजपाल यादव और नवाजुद्दीन सिद्दीकी यहीं से निकले हैं। इससे सिनेमा जगत की तरफ आकर्षित होने वाले युवा थियेटर के जरिये ही अपना रास्ता तलाश रहे हैं। लेकिन इन चमकीले सितारों के बीच संघर्ष करने वाले वे लाखों थिएटरकर्मी भी मौजूद हैं जो इस कला के जरिए अपनी रोजी-रोटी चलाने में भी खुद को असमर्थ पा रहे हैं। 

प्रसिद्ध रंगकर्मी राजेंदर नाथ के निर्देशन में मुंशी प्रेमचंद की कहानियों का एक मंचन सोमवार को दिल्ली में हुआ। इस मंचन के दौरान न सिर्फ पूरा हाल दर्शकों से भरा था, बल्कि नाटक के बीच कलाकारों को लगातार तालियां मिल रहीं थीं जो यह बता रहीं थी कि दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा था। नाटक के बाद जब दर्शकों से इसके बारे में उनकी प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने इसे बहुत उत्साहवर्धक बताया। कुछ दर्शकों का सुझाव था कि नाटकों के मंचन में अगर आधुनिक तकनीकी का बेहतर संयोजन हो तो इससे ज्यादा लोगों को जोड़ा जा सकता है। 

एनएसडी के एके बरुआ के मुताबिक दरअसल, नाटक अब बहुत खर्चीले हो गए हैं। एक मंचन के लिए एक हाल बुकिंग की कीमत ही 50 हजार से एक लाख रुपये के बीच होती है। कलाकारों, अभिनय की प्रैक्टिस के दौरान काफी खर्च होता है। सामान्य रंगमंच के लिए आज के दौर में दर्शकों से इतना वसूलना लगभग नामुमकिन होता है। यही कारण है कि आधुनिक तकनीकी का सीमित उपयोग, वह भी नाटक की थीम के ऊपर करना ही संभव हो पाता है।    
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