एशिया के सबसे बड़े विश्व पुस्तक मेले के आयोजक और 1972 से पुस्तक मेले की संस्कृति को आगे बढ़ाने वाले नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष और शिक्षाविद् प्रो. गोविंद प्रसाद शर्मा का मानना है कि डिजिटल जमाने से किताबों की दुनिया को बहुत फायदा हुआ है। उनका कहना है कि किताब खरीदने को लेकर लोगों में दिलचस्पी लगातार बढ़ रही है और केवल 2019 में एनबीटी ने तीन करोड़ किताबें बेची हैं।
पुस्तक मेले के आखिरी दिन एक लाख से ज्यादा लोग प्रगति मैदान के तमाम स्टॉल्स और हॉल्स में नजर आए और ज्यादा से ज्यादा छूट का फायदा उठाया। एनबीटी अध्यक्ष प्रो गोविंद शर्मा के मुताबिक गांधी जी की 150वीं जयंती वर्ष पर मेले की मुख्य थीम ‘गांधी : लेखकों के लेखक’ के तहत हर रोज कई-कई कार्यक्रम आयोजित हुए जिनमें गांधी जी को एक लेखक, संपादक, प्रकाशक, आलोचक और पत्रकार के तौर पर देखने और उनके लेखकीय आयामों के विस्तार को समेटने की कामयाब कोशिशें हुईं।
अमर उजाला से बात करते हुए प्रो. गोविंद शर्मा ने कहा कि यह उनके कार्यकाल का पहला पुस्तक मेला है, लेकिन वह मध्यप्रदेश में रहते हुए भी कई बार पुस्तक मेले में आए थे और इसकी भव्यता से परिचित थे। पिछले साल फरवरी में एनबीटी अध्यक्ष की जिम्मेदारी दिए जाने के बाद से उन्होंने संस्था के कामकाज को समझने के साथ ही इसके विस्तार की योजनाओं पर भी काम शुरू किया है।
मूल रूप से राजनीति विज्ञान विषय से जुड़े और शिक्षण के पेशे में अपना पूरा वक्त गुजारने वाले प्रो. शर्मा 80 साल के हो चुके हैं और खुद को शिक्षाविद् नहीं मानते। कहते हैं, जो काम मुझे दिया गया है, वह ईमानदारी से करना चाहता हूं और इन 10-11 महीने में मुझे बहुत कुछ देखने समझने को मिला है।
वह कहते हैं, साहित्य-संस्कृति से मेरा कोई वास्ता नहीं रहा है लेकिन एनबीटी में हर विषय और हर क्षेत्र की किताबें छापने और लेखकों को मदद करने की परंपरा को देखते हुए मुझे गर्व होता है। एनबीटी अकेली ऐसी संस्था है जो 54 भाषाओं और बोलियों में किताबें छापती है। पुस्तक मेलों, मोबाइल बस और दूसरे आयोजनों के जरिये हम देश के तमाम हिस्सों और सुदूर इलाकों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं।
एनबीटी की निदेशक नीरा जैन ने अमर उजाला को बताया कि उन्हें इस ट्रस्ट से जुड़े 30 साल हो गए और 1972 में दिल्ली के विंडसर प्लेस से शुरु हुए पुस्तक मेले का विस्तार होते होते आज ये दिल्ली समेत हर राज्य की राजधानियों तक पहुंच गया है। डिजिटल के बढ़ते प्रचलन और हर हाथ में मोबाइल होने के बाद भी किताबों का अपना सुख है, जैसे अखबार का महत्व कभी खत्म नहीं हो सकता वैसे ही छपी हुई किताबें भी हमेशा लोगों की पहली पसंद रहेंगी।