कोरोना संक्रमण को लेकर लगातार हो रहे शोध के नतीजे खासे चौंकाने वाले हैं। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद-सीएसआईआर के वैज्ञानिकों ने कहा है कि भारत और दुनिया में पाए जा रहे कोरोना का क्लैड 70 प्रतिशत तक मिलता-जुलता है।
इसलिए दुनिया भर में फैले वायरस की अनुवांशिक संरचना में समानता का अर्थ यह होगा कि इस नियंत्रण में करने के लिए अलग अलग दवाओं या वैक्सीन की जरूरत नहीं होगी। ऐसे हालातों में दुनिया में परीक्षण के दौर से गुजर रहीं एक ही वैक्सीन या दवा इस संहारक वायरस को खत्म करने के लिए पर्याप्त होगी।
सीएसआईआर की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर -सीसीएमबी के वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे अध्ययन में यह बात उभर कर सामने आई है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक बीमारियों के लिए जिम्मेदार वायरस अलग अलग क्लैड या अनुवांशिक समूह से संबंधित होते हैं। इसलिए वायरस के विभिन्न अनुवांशिक समूहों को खत्म करने के लिए अलग अलग तरह की वैक्सीन की जरूरत होती है।
शोधार्थी जो कोरोना के मामले में शोध कर रहे हैं, अध्ययन में पाया कि इस वायरस के कितने अनुवांशिक समूह भारत में सक्रिय हैं, लेकिन उन्होंने शोध के दौरान पाया कोरोना वायरस के मामले में यह स्थिति अलग है।
अध्ययन के दौरान देखा गया कि भारत में कोरोना वायरस का एटूए क्लैड सबसे अधिक कहर ढा रहा है, जो कि दुनिया भर में अब तक अध्ययन किए गए जीनोम से 70 फीसदी मिलता है। इससे पहले भारत में व्याप्त एथ्रीआई क्लैड में आई गिरावट के बाद महामारी के लिए जिम्मेदार ए टू ए क्लैड में बढ़ोतरी देखी गई है।
कोरोना वायरस के जीनोम का अध्ययन कर रहे सीसीएमबी के वैज्ञानिकों के मुताबिक दुनिया में वायरल जीनोम में समानता का मतलब है कि ए टू ए क्लैड को नियंत्रित करने वाली कोई भी एक वैक्सीन या दवा पूरे विश्व में समान प्रभाव के साथ काम करेगी।
वर्तमान में नए कोरोना वायरस के सभी भारतीय जीनोम सहित दुनिया के स्तर पर चिह्नित किए गए लगभग 70 प्रतिशत जीनोम इसी क्लैड एटूए के अंतर्गत आते हैं। सीसीएमबी के निदेशक डॉ. राकेश के मिश्रा ने कहा है कि जैसा कि इस क्लैड के अधिक संक्रामक होने की आशंका थी, एटूए जल्दी ही हर जगह की तरह भारत में भी प्रमुख रूप से फैलने वाला क्लैड बन गया।
वैश्विक स्तर पर वायरल जीनोम में समानता को एक सकारात्मक खबर माना जाना चाहिए, क्योंकि इस रूपांतरण को लक्षित करने वाली एक वैक्सीन या एक दवा पूरी दुनिया में समान प्रभाव के साथ काम करेगी।
हालांकि, डॉ. मिश्रा ने यह भी कहा है कि अभी इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि यह रूपांतरण चिकित्सीय रूप से कितना जटिल हो सकता है। वर्तमान में किसी भी क्लैड का संबंध निर्णायक रूप से कोरोना के अधिक गंभीर या मृत्यु के जोखिम में वृद्धि के साथ जुड़ा नहीं पाया गया है।
नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-जिनोमिकी और समवेत जीव विज्ञान संस्थान-आईजीआईबी और सीसीएमबी के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए इस अध्ययन के नतीजे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की शोध पत्रिका ओपेन फोरम इन्फेक्शियस डीजज में प्रकाशित किए गए हैं। इंडिया साइंस वायर ने भी इस लेख को प्रकाशित किया है।
इससे पहले जून में शोधकर्ताओं ने भारतीय आबादी में एक अलग वायरस की मौजूदगी का खुलासा किया था। इसे क्लैड आई/ एथ्रीआई नाम दिया गया था। इस वायरस को उसकी आनुवंशिक बनावट में चार विशिष्ट भिन्नताओं की उपस्थिति से पहचाना गया था।
उल्लेखनीय है कि सीएसआईआर-सीसीएमबी के वैज्ञानिक भारतीय आबादी में फैल रहे कोरोना वायरस के दो हजार से अधिक जीनोम का विश्लेषण कर चुके हैं।