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आधुनिक अनुभव के तनावों से मुक्ति का मार्ग

Sun, 29 Apr 2018 11:23 AM IST
आई.पी. ह्यूमन
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हड़बड़ी और बदहवासी में हम आधुनिक से इतना अधिक आधुनिक हो जाना चाहते हैं कि जहां हम अपने सांस्कृतिक अनुभव को भूल सकें। फिर कभी हम आधुनिकता से त्रस्त होकर परंपरा के आंचल में मुंह छिपा लेना चाहते हैं। लेकिन दोनों ही रास्ते हमारी आत्मछलना को और अधिक गहरा बनाते हैं।

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आस्था के बापू और उनकी हकीकत

भारत कृषि प्रधान देश के साथ-साथ अन्य कई क्षेत्रों में भी प्रधान देश बन चुका है। मसलन, भ्रष्टाचार प्रधान देश, जाति प्रधान देश, बेरोजगार प्रधान देश आदि-आदि। हालांकि, अंधविश्वास और पाखंड प्रधान तो यहां की महिमा ही है। इतने क्षेत्रों में प्रधान होने के बाद अब बाबाओं की करतूत की वजह से भी हमारे देश का नाम हो रहा है। कृषि प्रधान देश में हजारों किसान तंगहाली के कारण इच्छा मृत्यु की गुहार लगा रहे हैं। कृषि प्रधान देश होने के बावजूद भुखमरी और कुपोषण चरम पर है।

राजनीतिक प्रधान देश होकर लोकतंत्र लोकलज्जित होने लगा है, क्योंकि सफेद आवरण पहने कुछ नेता गलत कामों में लिप्त हैं। देवी-देवताओं के प्रधान देश में आज न तो दुर्गा सुरक्षित है, न ही सरस्वती। धर्म और आस्था की बातें खूब हो रही हैं, मगर दूसरी तरफ अधर्म भी अपने चरम पर है। भक्ति और आस्था का केंद्र रहा देश आज छद्म बाबाओं के कृत्यों से शर्मसार हो रहा है। भक्ति और भजन से लोग स्वर्ग के द्वार की चाह रखते थे, मगर भक्ति-भजन के केंद्र अनैतिक कृत्यों की कुकर्म स्थली बनती जा रही है, जो बेहद चिंतनीय है। 

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बलात्कारियों को भगवान का दर्जा

देश में गरीब और भिखारियों की कमी नहीं है, मगर उनकी ओर भक्तों का ध्यान नहीं जाता और राम रहीम, आसाराम सरीखे बलात्कारियों को हम भगवान का दर्जा दे देते हैं। एक सूक्ति है, ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता।” लेकिन आज इसका उल्टा हो रहा है। शुरू से हम यह पढ़ते आए हैं कि हमारा देश ज्ञान के क्षेत्र में विश्व गुरु रहा है, मगर मौजूदा हालातों को देखकर लगता है कि हम ज्ञान के क्षेत्र में नहीं वरन अज्ञान और अंधविश्वास के क्षेत्र में विश्व गुरु हैं। 

इस देश में न वोटर जागा है और न ही भक्त! वोटर नेताओं की झूठी बातों में आकर अपना बहुमूल्य संवैधानिक अधिकार बेच देता है और भक्त आंख बंद करके अपनी अस्मत लुटा देता है? विश्व के देश जहां वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन देकर ब्रह्मांड को समझने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर हम व हमारे नेता ऐसे विधर्मियों के पांव छूकर सिर-आंखों पर बैठा रहे हैं। ऐसे में मंदिर के पुजारी और लोकतंत्र के प्रहरियों को सोच-समझकर चुनने की आवश्यकता है।
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