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गंभीर दुर्घटना विकलांगता ही नहीं मानसिक घाव भी देती है : सुप्रीम कोर्ट

Sat, 19 Sep 2020 04:25 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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supreme court - फोटो : पीटीआई
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सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि अदालतों को वाहन दुर्घटना में मुआवजे के दावों का निस्तारण तय करते हुए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।

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शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को कहा, अदालतों को यह याद रखना चाहिए कि गंभीर चोट केवल विकलांगता ही नहीं देती बल्कि गहरे मानसिक और भावनात्मक घाव भी छोड़ जाती है। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने एक दुर्घटना में विकलांग हो गए युवक की याचिका पर मुआवजे को करीब तीन गुना बढ़ाने का आदेश दिया।


शीर्ष अदालत ने कहा कि उसने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि मुआवजे में वे सभी बातें ध्यान रखी जानी चाहिए, जो पीडि़त को दुर्घटना से पहले के स्तर के करीब ला सके।
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जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस एस. रविंद्र भट की पीठ ने कहा, कोई भी धन या अन्य तरह का मुआवजा मानसिक सदमे, दर्द और उस परिस्थिति की बराबरी नहीं कर सकते, जिससे पीडि़त एक गंभीर दुर्घटना के बाद गुजरता है। लेकिन मुआवजा राशि कुछ हद तक पुरानी स्थिति की बहाली के हालात जरूर बनाती है।

पीठ ने हाईकोर्ट के निर्णय पर टिप्पणी करते हुए कहा, हमारी राय में आपका दृष्टिकोण पूरी तरह मशीनी और वास्तविकताओं की अनदेखी वाला है। यह सच है कि एक हिस्से की चोट पूरे शरीर में स्थायी विकलांगता नहीं पहुंचा सकती, लेकिन अदालत को ये जांचना चाहिए कि जो चोट दावेदार की कमाने की क्षमता को घटाती है, उससे क्या हानि होगी।

पीठ ने कहा, अलग-अलग कारक अहम होते हैं, जिन्हें कमाई की क्षमता खोने का आकलन करते समय ध्यान में रखना होता है।

बदल जाती है पीडि़त की पूरी दुनिया
पीठ ने कहा, दुर्घटना के सदमे से पीड़ित की पूरी दुनिया बदल जाती है। जिस दुनिया में वह जन्मा था, उसी में अमान्य हो जाता है। उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। उसकी निजी पसंद या स्वायत्तता पूरी तरह छिन जाती है।

ये बातें हमेशा मुआवजा तय करते समय जज के दिमाग में होनी चाहिए। पीठ ने कहा, ऐसी चोट पीड़ित की गरिमा को भी घटाती हें। यदि अदालतें भी इन हालातों में उनके मुआवजे में कंजूसी करेंगी तो ये पीड़ित के लिए अपमान जैसा फैसला होगा।

7.77 लाख से बढ़ाकर 19.65 लाख किया मुआवजा
हाईकोर्ट ने इस मामले में 7,77,600 रुपये का मुआवजा पीड़ित को दिए जाने का आदेश सुनाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने इसे बढ़ाकर 19,65,600 रुपये कर दिया। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह बढ़ोतरी पीड़ित के कमाने की योग्यता खोने और भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर तय किया गया है।

शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस तर्क से असहमति जताई कि ‘भविष्य की संभावनाओं’ के लिए आय में बढ़ोतरी केवल मौत के मामले में ही दी जा सकती है, चोट के लिए नहीं।

यह था पूरा मामला
याचिकाकर्ता पप्पू देव यादव दुर्घटना से पहले दिल्ली की तीस हजारी अदालत में 12 हजार रुपये प्रतिमाह के वेतन पर डाटा इंट्री ऑपरेटर का काम करता था। दुर्घटना में उसे दाहिने हाथ की शक्ति पूरी तरह खत्म हो गई थी।

इसके बाद पप्पू ने सौ फीसदी स्थायी विकलांगता का दावा करते हुए 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की। लेकिन उसकी विकलांगता को 89 फीसदी आंका गया।

मोटर वाहन दावा अधिकरण और दिल्ली हाईकोर्ट ने उसकी विकलांगता को दोबारा से निर्धारित करते हुए इस आधार पर महज 45 फीसदी प्रभाव माना कि उसने केवल एक हाथ ही खोया था।

शीर्ष अदालत ने इस पर हाईकोर्ट को गलत ठहराया और कहा कि यह निर्णय मशीन की तरह काम करते हुए वास्तविकताओं की अनदेखी कर लिया गया।

अदालतों को एक रूढि़वादी या अदूरदर्शी दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए, बल्कि जीवन की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए अक्षमता की सीमा का आकलन और मुआवजे का निर्धारण करना चाहिए।
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- शीर्ष अदालत ने फैसले में कहा

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