सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को लखनऊ के एक वकील की याचिका खारिज कर दी। वकील ने याचिका में आरोप लगाया था कि न्यायालय में घोषित 25,000 रुपये के बजाय। उस पर अक्टूबर 2023 में एक जनहित याचिका दायर करने के लिए पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था।
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने 13 अक्टूबर, 2023 को वकील अशोक पांडे द्वारा दायर जनहित याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय, जो अब दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश हैं, को बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में फिर से शपथ दिलाई जाए क्योंकि संविधान के तहत निर्धारित तरीके से शपथ नहीं ली गई थी।
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हम आदेश का पालन करेंगे: सुप्रीम कोर्ट
पांडे के अनुसार, पीठ ने खुले न्यायालय में उन पर तुच्छ जनहित याचिका दायर करने के लिए 25,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था। हालांकि उन्होंंने बाद में दावा किया कि आदेश में जुर्माने के तौर पर पांच लाख रुपये का उल्लेख था। अब कलेक्टर उनसे राशि की वसूली के लिए कार्रवाई करने का प्रस्ताव कर रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और जॉयमाल्य बागची की पीठ ने पांडे की 2023 के आदेश में संशोधन और इस मामले की जांच की मांग वाली नई याचिका को खारिज करते हुए कहा, "हम आदेश का पालन करेंगे, और इसमें पांच लाख रुपये शामिल हैं।" मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, "ये सभी प्रचार याचिकाएं हैं।"
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बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने मैं शब्द प्रयोग नहीं किया
2023 की जनहित याचिका में कहा गया था कि जब न्यायमूर्ति उपाध्याय ने उस वर्ष 29 जुलाई को बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली थी, तो उन्होंने अपना नाम लेने से पहले 'मैं' शब्द का प्रयोग नहीं किया था, जो संविधान की तीसरी अनुसूची का उल्लंघन था। तब न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और मनोज मिश्रा सहित अन्य न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था, "तुच्छता की भी एक सीमा होती है"। पीठ ने कहा था "याचिका में न्यायमूर्ति डी.के. उपाध्याय को बॉम्बे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नए सिरे से शपथ दिलाने की मांग की गई है। इसमें यह भी कहा गया है कि राज्यपाल और गोवा, दमन और दीव के मुख्यमंत्री को समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया था।"
पीठ ने कहा "यह जनहित याचिका के अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग करके प्रचार पाने का एक तुच्छ प्रयास मात्र है। ऐसी तुच्छ जनहित याचिकाएं अदालत का समय बर्बाद करती हैं। अदालत को महत्वपूर्ण मामलों पर सुनवाई करने से विचलित करती हैं।"