हम डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं। ऐसे में निजता का अधिकार ‘पूर्ण’ नहीं हो सकता है। इस पर तार्किक पाबंदियां लगाई जा सकती हैं। अगर हम निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार करार देते हैं, तो समलैंगिकता के खिलाफ दिया गया हमारा आदेश दोषपूर्ण हो जाएगा।
ऐसें में कोई भी इसका हवाला देकर यौन प्राथमिकता को अपनी निजता बता सकता है। निजता मौलिक अधिकार है या नहीं, इस मसले का परीक्षण कर रही सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने यह टिप्पणी की।
पीठ ने कहा कि निजता के अधिकार को परिभाषित करने के प्रयास में फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। जहां तक नागरिकों की निजी जानकारी के संरक्षण का सवाल है, तो इसके लिए वैधानिक तरीके अपनाए जा सकते हैं।
अगर निजता को परिभाषित करना जरूरी है, तब हम तार्किक पाबंदी के साथ इसका पैमाना तय कर सकते हैं, लेकिन क्या यह अतिरेक नहीं होगा कि हम राज्य को नीति बनाने से रोके। यौन प्राथमिकता भी निजता का अधिकार हो सकता है।
अगर हम इसे सही ठहराते हैं, तो नाज फाउंडेशन मामले में हमारे द्वारा समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखने का फैसला दोषपूर्ण हो जाएगा। चीफ जस्टिस जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली इस संविधान पीठ में जस्टिस जे चेलमेश्वर, एस ए बोबडे, आर के अग्रवाल, रोहिंगटन फली नरीमन, अभय मनोहर सप्रे, डी वाई चंद्रचूड़, संजय किशन कौल और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। याचियों की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल, सोली सोराबजी, श्याम दीवान और अरविंद दातार ने अपनी दलीलें पेश कीं। सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी।