संसदीय समिति ने डिजिटल न्याय को ‘सस्ता और तेज’ बताते हुए कोरोना महामारी के बाद भी वर्चुअल अदालतों को जारी रखने की सिफारिश की है। विधि व न्याय मामलों पर संसद की स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अदालत स्थान से ज्यादा सेवा है।
डिजिटल सुनवाई से प्रक्रिया में तेजी आती है और ज्यादा किफायती व लोगों के अनुकूल होती है। न्याय तक पहुंच बढ़ती है। आने वाले समय में तकनीक गेम चेंजर साबित होगी और वकीलों को समय के साथ बदलना होगा।
भाजपा सांसद भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को अंतरिम रिपोर्ट सौंपी है। कोविड-19 के प्रभाव को लेकर किसी संसदीय समिति की यह पहली रिपोर्ट है।
इसमें समिति ने वर्चुअल अदालतें जारी रखने का समर्थन करते हुए कहा, डिजिटल न्याय सस्ता और तेज होने के साथ स्थानीय व आर्थिक बाधाओं को दूर करता है। गवाहों को सुरक्षा देता है। महामारी खत्म होने के बाद सभी पक्षों की सहमति से मामलों की चिह्नित श्रेणियों में डिजिटल माध्यम से सुनवाई जारी रखी जानी चाहिए।
समिति ने सुझाव दिया कि देशभर की टीडीएसएटी, आईपीएबी और एनसीएलएटी जैसी अपीली अदालतों में डिजिटल सुनवाई को स्थायी किया जा सकता है, जिनमें पक्षों व वकीलों को निजी रूप से पेश होने की जरूरत नहीं है।
तकनीक के लिए खोलें अदालत के दरवाजे
बार प्रतिनिधियों ने वर्चुअल अदालतों में सुनवाई को लेकर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि 50 फीसदी से ज्यादा वकीलों के पास लैपटॉप और कंप्यूटर नहीं हैं। इससे सिर्फ तकनीकी रूप से दक्ष वकीलों को फायदा होगा।
फिजिकल सुनवाई के दौरान वकील को जज का मूड समझने और उन्हें समझाने का बेहतर अवसर मिलता है। ऑनलाइन सुनवाई के दौरान वकीलों के साथ साथ जजों पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है।
वकीलों की चिंताओं पर समिति ने स्वीकार किया कि वर्चुअल अदालतों में कमियां थीं, जिनमें लगातार सुधार हुआ है। लिहाजा अब समय है कि पुरानी कार्यशैली का गढ़ कही जाने वाली अदालतें नई टेक्नोलॉजी के लिए अपने दरवाजे खोलें।